CLASS XII POL SC UNIT I प्रमुख अवधारणाएं

UNIT : 1 प्रमुख अवधारणाएं

 

L -1 न्याय की प्रमुख अवधारणाएं

 

न्याय का अर्थ :-

न्याय यानि Justice लैटिन शब्द Justia से
बना है जिसका अर्थ है जोड़ना या सम्मिलित करना।

न्याय शब्द की व्याख्या अलग अलग विचारकों ने अपने अपने ढंग से की है। जहां
प्राचीन भारतीय विचारकों ने न्याय को धर्म से जोड़कर कर्तव्य पालन पर बल दिया है। वहीं
पाश्चात्य विचारकों में सर्वप्रथम प्लेटो ने न्याय को आत्मीय गुण माना, अरस्तु ने न्याय
को सद्गुण माना, मध्यकालीन विचारकों ने व्यक्ति के राज्य की प्रति कर्तव्यों के पालन
को न्याय माना।

 आधुनिक काल
में डेविड ह्यूम, बेंथम, मिल आदि ने न्याय को उपयोगिता के सिद्धांत से सम्बद्ध किया
है, वहीं जॉन रॉल्स ने औचित्य पूर्ण न्याय की चर्चा की है।

(A) प्लेटो की न्याय की
अवधारणा
:-

 पाश्चात्य
विचारकों में से सर्वप्रथम प्लेटो ने ही न्याय की अवधारणा की व्याख्या की है। उसने
अपनी पुस्तक रिपब्लिक में न्याय को समझाने का प्रयास किया है। प्लेटो के समय यूनान
में न्याय संबंधी निम्न तीन सिद्धांत प्रचलित थे :-

1. परंपरावादी :- इस सिद्धांत के प्रतिपादक सैफालस
थे।उसके अनुसार न्याय सत्य बोलने और कर्ज चुकाने में निहित है।

2. उग्रवादी :- इस सिद्धांत के प्रतिपादक थ्रेसीमेकस
थे। उसके अनुसार शक्तिशाली का हित ही न्याय है।

3. यथार्थवादी :- इस सिद्धांत के प्रतिपादक ग्ल्यूकोन थे।

इसके अनुसार न्याय भय का शिशु है और कमजोर की आवश्यकता है।

प्लेटो इन तीनों विचारधाराओं से सहमत नहीं था। उसने न्याय को आत्मा
का सद्गुण माना है। उसके अनुसार न्याय से तात्पर्य है :- प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपना निर्दिष्ट कार्य
करना और दूसरों के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करना।

इस संबंध में प्लेटो ने न्याय के दो रूप बताए हैं :-

1. व्यक्तिगत न्याय :-

व्यक्तिगत न्याय के अनुसार प्लेटो का मानना था कि प्रति व्यक्ति को
वही कार्य करना चाहिए जिसको करने में वह प्राकृतिक रूप से समर्थ और सक्षम हो। जैसे
किसी व्यक्ति में अध्यापन की क्षमता है तो उसे शिक्षण कार्य, सीमाओं की रक्षा करने
की क्षमता है तो उसे सैनिक कार्य और उत्पादन करने की क्षमता है तो उसे किसान का कार्य
करना चाहिए।

2. सामाजिक न्याय :-

प्लेटो के अनुसार मानव आत्मा में तीन तत्व पाए जाते हैं :- तृष्णा, साहस और विवेक।

आत्मा के इन तीनों तत्वों के अनुसार उसने समाज को तीन भागों में विभाजित
किया है :-

·       उत्पादक वर्ग :- इस वर्ग में इंद्रिय तृष्णा और इच्छा तत्व की प्रधानता
पाई जाती हैं। इस वर्ग में किसान, व्यापारी आदि आते हैं।

·       सैनिक वर्ग :- इस वर्ग में
साहस तथा शौर्य तत्व की प्रधानता पाई जाती हैं। ऐसे व्यक्ति सैनिक कार्य करते हैं।

·       शासक वर्ग :- इस वर्ग के व्यक्तियों में विवेक अर्थात बुद्धि
तत्व की प्रधानता पाई जाती हैं। ऐसे व्यक्ति शासन प्रक्रिया में भाग लेते हैं। जैसे
शासक मंत्री, अधिकारी, न्यायाधीश आदि। प्लेटो ने इस वर्ग को अभिभावक वर्ग भी कहा है ।

इस प्रकार प्लेटो के अनुसार जिस प्रकार आत्मा मनुष्य के विभिन्न पक्षों
में संतुलन स्थापित किए रहती है, ठीक उसी प्रकार यदि समाज के तीनों वर्ग अपनी अपनी
क्षमता से अपने निर्दिष्ट कार्य करें और अन्यों के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करें तो
राज्य में न्याय की स्थापना होगी।

इस प्रकार प्लेटो ने न्याय को नैतिक सिद्धांत के रूप में प्रतिपादित किया
है ।

 

( B ) अरस्तु की न्याय संबंधी अवधारणा :-

                     अरस्तू प्लेटो का शिष्य था। उसके अनुसार न्याय का सरोकार मानवीय संबंधों
के लिए नियमन से है। अरस्तु ने न्याय की कानूनी अवधारणा प्रस्तुत की। अरस्तु ने न्याय
को दो रूप में प्रस्तुत किया है :-

1. वितरणात्मक न्याय :-

अरस्तु के अनुसार पद, प्रतिष्ठा, धनसंपदा, शक्ति व राजनीतिक
अधिकारों का वितरण व्यक्ति की योग्यता और उसके द्वारा राज्य के प्रति की गई सेवा के
अनुसार किया जाना चाहिए।

अरस्तु के अनुसार न्याय का वितरण अंकगणितीय अनुपात से न होकर रेखागणितीय अनुपात
में होना चाहिए अर्थात सबको बराबर हिस्सा न मिलकर अपनी अपनी योग्यता के अनुसार हिस्सा
मिलना चाहिए।

2. सुधारात्मक न्याय :-

इस न्याय के अनुसार नागरिकों को वितरणात्मक न्याय से प्राप्त अधिकारों
का अन्य व्यक्ति द्वारा दुरुपयोग व हनन नहीं हो । राज्य व्यक्ति के जीवन, संपत्ति, सम्मान, स्वतंत्रता व अधिकारों की रक्षा करें अर्थात वितरणात्मक न्याय
से प्राप्त अधिकारों की राज्य द्वारा रक्षा करना ही सुधारात्मक न्याय है।

इस प्रकार अरस्तु के न्याय की अवधारणा कानूनी थी।

(C) मध्यकालीन न्याय की अवधारणा :-

मध्यकाल में संत अगस्टाइन और थामस एक्विनास ने न्याय की अवधारणा प्रस्तुत की
है। इस काल में राज्य को ईश्वरीय कृति माना जाता था।

संत ऑगस्टाइन ने अपनी पुस्तक ” सिटी ऑफ गॉड
” में न्याय की अवधारणा प्रस्तुत की है।

संत अगस्टाइन के अनुसार व्यक्ति द्वारा ईश्वरीय राज्य के प्रति कर्तव्य
पालन ही न्याय हैं।

थॉमस एक्विनास के अनुसार न्याय एक व्यवस्थित व अनुशासित जीवन व्यतीत करने
में और व्यवस्था के अनुसार कर्तव्यों के पालन में निहित है।

(D) आधुनिक काल में न्याय संबंधी अवधारणा:-

आधुनिक युग में डेविड ह्यूम, जेरेमी बेंथम और जॉन स्टूअर्ट मिल ने उपयोगितावादी
सिद्धांत के आधार पर न्याय के प्रत्यय को परिभाषित करने का कार्य किया है।

डेविड ह्यूम के अनुसार न्याय उन नियमों की पालना मात्र हैं जो सर्वे हित
का आधार हैं।

इसी प्रकार बेंथम के अनुसार सार्वजनिक वस्तुओं, सेवाओं, पदों आदि का वितरण
उपयोगितावादी सिद्धांत के आधार पर हो। अर्थात जो उपयोगी है और सुखदायक हैं वही कार्य
होने चाहिए। इस प्रकार बेन्थम ने अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख के आधार पर न्याय की अवधारणा
प्रस्तुत की है।

जॉन स्टूअर्ट मिल के अनुसार मनुष्य अपनी सुरक्षा हेतु ऐसे नैतिक नियम
स्वीकार करता है जिनसे दूसरे भी वैसी ही सुरक्षा का अनुभव कर सके। अर्थात उपयोगिता
ही न्याय का मूल मंत्र है।

 

(E) जॉन रॉल्स के न्याय संबंधी विचार:-

जॉन रॉल्स ने अपनी पुस्तक थ्योरी ऑफ़ जस्टिस में सामाजिक न्याय का विश्लेषण
किया है। रॉल्स परंपरावादियों के इस विचार से असंतुष्ट थे कि सामाजिक संस्थाओं को न्यायपूर्ण बनाने पर बल दिया जाए। रॉल्स उपयोगितावादियों
के अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख पर आधारित न्याय व्यवस्था की धारणा को दोषपूर्ण बताते
हुए कहा है कि इस सिद्धांत से बहुमत की अल्पमत पर तानाशाही स्थापित होती हैं अर्थात
किसी कार्य को करने से यदि 80% लोगों का
कल्याण होता है तो भी उस कार्य को न्यायप्रद नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि वह कार्य
20% लोगों के विरुद्ध है।

रॉल्स संवैधानिक लोकतंत्र में न्याय के 2 मौलिक नैतिक सिद्धांत बताए हैं :-

·       अधिकतम स्वतंत्रता स्वयं स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं।
इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को उतनी ही व्यापक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए
जो अन्य लोगों को प्राप्त है अर्थात एक महिला को भी उतनी ही स्वतंत्रता मिलनी चाहिए
जितनी कि एक पुरुष को मिलती है।

·       व्यक्ति और राज्य द्वारा ऐसी सामाजिक व आर्थिक स्थितियाँ स्थापित की
जानी चाहिए जो सबके लिए कल्याणकारी हो। ऐसी स्थितियां केवल अज्ञानता के पर्दे के सिद्धांत
के आधार पर ही स्थापित की जा सकती हैं।

 

रॉल्स का अज्ञानता के
पर्दे का सिद्धांत
:-

इस सिद्धांत के अनुसार सभी व्यक्ति अपनी स्वयं की विशिष्ट पृष्ठभूमि
और स्थिति को मध्य नजर रखते हुए अपना विकास करते हैं। इस स्थिति में व्यक्ति स्वयं
अपनी स्थिति के अनुसार अच्छे बुरे कार्य द्वारा अपने विकास में जुट जाता है और उसका
एकमात्र लक्ष्य स्वयं अपना विकास करना रहता है। परंतु यदि व्यक्ति अपनी विशेष पृष्ठभूमि
और स्थिति से अनभिज्ञ हो जाए तो वह विकास के केवल वही दृष्टिकोण अपनाता है जो नैतिक
दृष्टि से सही है। अर्थात अगर व्यक्ति को इस बात का ज्ञान नहीं हो कि उसके द्वारा किए
जाने वाले कार्य से उसका या उसके परिचितों का अच्छा या बुरा नहीं होने वाला है तो वह
सदैव नैतिक नियमों के अनुसार ही कार्य करेगा।

अतः रॉल्स समाज/राज्य के विकास के लिए ऐसे ही सिद्धांत को न्यायप्रद
मानता है जिसमें लोग स्वयं ही अज्ञानता का पर्दा स्वीकार कर लेते हैं।

 

(F) न्याय की भारतीय अवधारणा :-

प्राचीन भारत में मनु, कौटिल्य, बृहस्पति, शुक्र, भारद्वाज आदि ने न्याय
को स्वधर्म से जोड़कर व्यक्ति को समाज में उसके नियत स्थान और उसके
निर्दिष्ट कर्तव्यों का अभिज्ञान कराया हैं। उनकी इस अवधारणा ने तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था
में सामंजस्य स्थापित करने का कार्य किया है। उनके अनुसार स्वधर्म की पालना में ही
व्यक्ति के अधिकारों की उत्पत्ति निहित है। इस प्रकार प्राचीन भारतीय विचारकों ने न्याय
के कानूनी रूप को स्वीकार किया है।

 

न्याय के विभिन्न रूप

 

परंपरागत रूप में न्याय की दो धारणाएं नैतिक न्याय और कानूनी न्याय
प्रचलित थी। परंतु आधुनिक समय में इनके अलावा राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक न्याय की
अवधारणा भी महत्वपूर्ण है।

(1) नैतिक न्याय :-

न्याय की मूल अवधारणा नैतिकता पर ही आधारित हैं। इसके अनुसार प्राकृतिक
नियमों व प्राकृतिक अधिकारों के अनुसार जीवन यापन करना ही नैतिक न्याय है। जब व्यक्ति
सत्य, अहिंसा, सदाचार, दया, उदारता आदि नैतिक गुणों से युक्त होकर आचरण करता है तो
उसे नैतिक न्याय कहा जाता है।

(2) कानूनी न्याय :-

जब व्यक्ति राज्य के कानून का अनुसरण करें तो उसे कानूनी न्याय का जाता
है। कानूनी न्याय की धारणा दो बातों पर बल देती हैं :-

(i) सरकार द्वारा निर्मित कानून न्यायोचित होने चाहिए

 (ii) निर्मित
कानूनों को सभी पर न्यायपूर्ण ढंग से लागू किया जाना चाहिए।

(3) राजनीतिक न्याय :-

राजनीतिक न्याय की प्राप्ति के लिए संविधान और संवैधानिक शासन आवश्यक
है। ऐसा न्याय केवल लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में ही प्राप्त किया जा सकता
है। राजनीतिक न्याय के तहत व्यस्क मताधिकार, विचार, भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, चुनाव लड़ने और बिना किसी भेदभाव
के सार्वजनिक पद प्राप्त करने का अधिकार होता है। एक राजनीतिक व्यवस्था में सबको समान अधिकार व अवसर प्राप्त होने चाहिए। राजनीतिक न्याय भेदभाव और असमानता को अस्वीकार करता है। यह सभी व्यक्तियों के कल्याण पर आधारित होता है।

(4) सामाजिक न्याय :-

 समाज में
किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार न हो और सभी को अपने व्यक्तित्व के विकास का समान अवसर मिले। यही सामाजिक
न्याय है।

 जॉन रॉल्स
ने अपना न्याय सिद्धांत सामाजिक न्याय के संदर्भ में ही प्रस्तुत किया है। उसके अनुसार यदि समाज में सभी को विकास के समान अवसर नहीं मिलेंगे तो
स्वतंत्रता और समानता जैसे मूल्यों का कोई अर्थ नहीं रहेगा। इस न्याय के तहत राज्य
से यह अपेक्षा की जाती हैं कि वह ऐसी नीतियों का निर्माण करें जिससे एक समतामूलक समाज
की स्थापना हो।

(5) आर्थिक न्याय :-

   
            आर्थिक न्याय के अनुसार समाज में आर्थिक समानता स्थापित होनी चाहिए
अर्थात् अमीरी और गरीबी के बीच की खाई दूर होनी चाहिए जिससे सभी व्यक्ति आर्थिक रूप
से बराबर होंगे। परंतु व्यवहार में ऐसा संभव नहीं है। आर्थिक न्याय धनसंपदा के कारण
उत्पन्न असमानता अर्थात गरीबी और अमीरी का विरोध करता है और इसे कम करने पर बल देता
है। इसके अनुसार आर्थिक न्याय की स्थापना के लिए राज्य को आर्थिक संसाधनों का वितरण
करते समय व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखना चाहिए और व्यक्तिगत संपत्ति के
अधिकार को सीमित करना चाहिए।

 निष्कर्ष :-

               न्याय की उपरोक्त सभी अवधारणाओं के अध्ययन से स्पष्ट है कि न्याय का
जो लक्ष्य प्राचीन काल में स्थापित किया गया था वह आज भी प्रासंगिक है। न्याय का सिद्धांत
मूल रूप से सामाजिक जीवन में लाभ और दायित्वों के तर्कसंगत वितरण से संबंधित है। वर्तमान
में न्याय की चर्चा ऐसे समाजों में ही प्रासंगिक है जिनमें वस्तुओं, सेवाओं व अवसरों  का अभाव हो और प्रचलित कानूनों,
अधिकारों, स्वतन्त्रताओं आदि में और अधिक सुधार की गुंजाइश हो।

<

p style=”height: 0px; text-align: left;”>

L – 2. शक्ति, सत्ता और वैधता

शक्ति का अर्थ :-

       
         शक्ति अंग्रेजी भाषा के शब्द POWER का हिंदी पर्याय है जो लैटिन भाषा के POTERE शब्द से बना हुआ है जिसका अर्थ है – योग्य
के लिए अर्थात निहित योग्यता।

परिभाषा :-

1. मैकाइवर के अनुसार, “शक्ति किसी संबंध के अंतर्गत ऐसी क्षमता है जिसमें दूसरों से कोई काम
लिया जाता है या आज्ञा पालन कराया जाता है।”

2. आर्गेन्सकी के अनुसार, “शक्ति दूसरों के आचरण को अपने लक्ष्यों के अनुसार प्रभावित करने की
क्षमता है।”

3. रॉबर्ट बायर्सटेड के अनुसार, “शक्ति बल प्रयोग की योग्यता है न की उसका वास्तविक प्रयोग।”

               इस प्रकार स्पष्ट है कि जिसके पास शक्ति है, वह दूसरों के कार्यों, व्यवहारों और विचारों को अपने अनुकूल बना सकता है।

 शक्ति की पृष्ठभूमि
:-

                 निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर हम शक्ति की पृष्ठभूमि को स्पष्ट कर सकते हैं :-

1)      शक्ति प्राचीन काल से ही राजनीति विज्ञान की मूल अवधारणा रही है।

2)      प्राचीन भारतीय चिंतन में मनु, कौटिल्य, शुक्र आदि ने शक्ति के विभिन्न
तत्वों पर प्रकाश डाला है।

3)      यूरोपीय विचारकों में मैक्यावली को प्रथम शक्तिवादी विचारक माना जाता है।

4)      टॉमस हॉब्स ने अपनी पुस्तक “लेवियाथन” में शक्ति के महत्व को स्वीकारा
है।

5)      आधुनिक काल में शक्ति राजनीति विज्ञान की अवधारणा के रूप में सामने
आई है।

6)      शक्ति की अवधारणा को स्पष्ट करने में कैटलिन, लासवेल, कैप्लान, मॉर्गेन्थाउ आदि ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

7)      कैटलिन
ने राजनीति विज्ञान को शक्ति के विज्ञान के रूप
में परिभाषित किया है।

8)      लॉसवेल ने अपनी पुस्तक “Who gets, What, When, How ” में
शक्ति की अवधारणा स्पष्ट की है।

9)      
मैकाइवर ने अपनी
पुस्तक “द वेव
ऑफ गवर्नमेंट”  में शक्ति को परिभाषित किया है।

 

शक्ति एवं बल में अंतर :-

 

शक्ति

बल

1. शक्ति प्रच्छन बल है।

1. बल प्रकट शक्ति है।

2. शक्ति अप्रकट तत्व है।

2. बल प्रकट तत्व है।

3. शक्ति एक मनोवैज्ञानिक क्षमता है।

3. बल एक भौतिक क्षमता है।

 

शक्ति एवं प्रभाव में समानताएं :-

1. दोनों एक दूसरे को सबलता प्रदान करते है।

2. दोनों औचित्यपूर्ण होने पर ही प्रभावशाली होते
है।

3. प्रभाव शक्ति को उत्पन्न करता है और शक्ति
प्रभाव को बढ़ाती है।

 

शक्ति एवं प्रभाव में अंतर :-

 

शक्ति

प्रभाव

1. शक्ति की प्रकृति दमनात्मक होती है।

1. प्रभाव की प्रकृति मनोवैज्ञानिक होती है।

2. शक्ति सम्बन्धात्मक नहीं होती है।

2. प्रभाव संबंधात्मक होता है।

3. शक्ति का प्रयोग इच्छा विरुद्ध भी हो सकता
है।

3. प्रभाव सहमति पर आधारित होता है।

4. यह अप्रजातांत्रिक है।

4. प्रभाव प्रजातान्त्रिक है।

5. शक्ति के अस्तित्व के लिए प्रभाव की आवश्यकता
होती है।

5. प्रभाव के अस्तित्व के लिए शक्ति की आवश्यकता
नहीं  होती है।

 

शक्ति के विभिन्न रूप :-

        

  
वर्तमान में शक्ति के निम्न तीन
रूप प्रचलित है :-

1. राजनीतिक शक्ति :-

               सरकार और शासन को प्रभावित करने वाले समस्त तत्वों जैसे पद, पुरस्कार, प्रतिष्ठा आदि से संबंधित शक्ति राजनीतिक शक्ति कहलाती है। राजनीतिक शक्ति का प्रयोग शासन के औपचारिक और अनौपचारिक अंगों द्वारा किया जाता
है। औपचारिक अंगों में व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका
द्वारा और अनौपचारिक अंगों में  राजनीतिक दल, दबाव समूह, प्रभावशाली व्यक्तियों आदि द्वारा  राजनीतिक शक्ति का प्रयोग किया
जाता है।

2. आर्थिक शक्ति :-

             आर्थिक शक्ति का तात्पर्य उत्पादन के संसाधनों और धन-संपदा पर स्वामित्व से हैं अर्थात जो व्यक्ति आर्थिक रूप से शक्तिशाली
होते हैं, वे राजनीतिक रूप से भी सशक्त
होते है। मार्क्सवाद का मानना है कि राजनीतिक शक्ति को निर्धारित करने में आर्थिक
शक्ति का अहम योगदान होता है जबकि उदारवाद राजनीतिक शक्ति के निर्धारण में आर्थिक
शक्ति की भूमिका कम मानते है।

3. विचारधारात्मक शक्ति :-

                   विचारधारा का अर्थ है विचारों का समूह जिसके आधार पर हम हमारे दृष्टिकोण का विकास करते है। विचारधारा लोगों के सोचने और समझने के ढंग को प्रभावित करती है। अलग-अलग विचारधारा वाले लोग अलग-अलग शासन व्यवस्था को उचित ठहराते है। भिन्न-भिन्न देशों में भिन्न-भिन्न प्रकार की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्थाएं प्रचलित है जिनके आधार पर उन देशों में उदारवाद, समाजवाद, साम्यवाद आदि अनेक विचारधाराएं
प्रचलित है।

 

शक्ति के सिद्धांत :-

 

1. वर्ग प्रभुत्व का सिद्धांत :-

                यह सिद्धांत मार्क्सवाद की देन है। इस सिद्धान्त
के अनुसार समाज आर्थिक आधार पर दो भागों में विभाजित
है :-

(i) बुर्जुआ वर्ग       :      पूंजीपति
लोग

(ii) सर्वहारा वर्ग    :       गरीब व
मजदूर

              मार्क्सवाद का मानना है कि अब तक का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा
है अर्थात अपना प्रभुत्व स्थापित करने के उद्देश्य से दोनों ही वर्ग आपस में संघर्ष
करते आए है।

2. विशिष्ट वर्गीय सिद्धांत :-

              इस सिद्धांत की आधारशिला पेरेटो, मोस्का व मिचेल्स ने रखी है। उन्होंने समाज को दो भागों में विभाजित किया है :-

(i) विशिष्ट वर्ग  तथा (ii) सामान्य वर्ग

यह विभाजन केवल आर्थिक आधार पर ही नहीं बल्कि अनेक अन्य आधारों जैसे कुशलता, संगठन, क्षमता, बुद्धिमता आदि के आधार पर किया गया है। इस सिद्धांत के आधार पर प्रत्येक शासन व्यवस्था में अपनी योग्यताओं
के आधार पर एक छोटा वर्ग उभर कर सामने आता है जो सामान्य वर्ग पर अपनी शक्ति का प्रयोग
करता है। जैसे राजनेता, डॉक्टर, वकील, प्रोफेसर, उद्योगपति आदि।

3. नारीवादी सिद्धांत :-

              इस सिद्धांत के अनुसार समाज में शक्ति का बंटवारा लैंगिक आधार पर किया गया है। समाज की सारी शक्ति पुरुषों के अधीन है जिसका प्रयोग पुरुषों द्वारा
महिलाओं पर होता है। समानता के सिद्धांत के आधार पर नारीवादी संगठनों ने नारी मुक्ति और
नारी स्वाधीनता आंदोलन चलाकर नारी को बराबरी का दर्जा देने
की मांग की है।

4. बहुलवादी सिद्धांत :-

             इस सिद्धांत के अनुसार समाज में समस्त शक्ति किसी एक वर्ग के हाथ में होकर अनेक समूहों में बंटी हुई होती हैं।  उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था में इन अनेक समूहों के मध्य सतत सौदेबाजी चलती रहती है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन रॉबर्ट डहल ने
किया था।

 

सत्ता

                  

 सत्ता की अवधारणा समझने के लिए हम एक उदाहरण लेते है। एक पुलिस वाले और एक गुंडे दोनों में शक्ति निहित
होती है। सम-विषम परिस्थितियों में हम इन दोनों के दिए गए आदेशों की पालना करते हैं। परंतु इन आदेशों की पालना में एक विशेष अंतर होता है, वह यह है कि एक पुलिस वाले
के आदेश की पालना हम अपनी सहमति से करते हैं क्योंकि हम जानते हैं कि उसे विधि या कानून
द्वारा आदेश देने की शक्ति प्राप्त है जबकि हम एक गुंडे के आदेशों की पालना मात्र जानमाल
के खोने के भय के कारण करते हैं। जब यह डर हट जाता है तो हम उसके आदेशों की पालना भी नहीं करते है।

       
इस प्रकार स्पष्ट है कि जब शक्ति
के साथ वैधता जुड़ जाती हैं तो ऐसी शक्ति सत्ता बन जाती है।

 इस प्रकार
सत्ता किसी व्यक्ति, संस्था, नियम या आदेश का वह गुण है जिसे हम सही ( वैध ) मानकर स्वेच्छा से उसके निर्देशों
की पालना करते हैं अर्थात वैध शक्ति ही सत्ता है।

 हेनरी फेयोल
के अनुसार
, “सत्ता आदेश देने का अधिकार और आदेश की पालना कराने की शक्ति है।”

 

 सत्ता पालन के आधार :-

                   कोई व्यक्ति किसी भी सत्ता पालना निम्नलिखित आधारों
पर करता है :-

1. विश्वास :-

           सत्ता पालन का सबसे महत्वपूर्ण आधार है विश्वास। यदि अधीनस्थ को इस बात का विश्वास है कि सत्ताधारी का दिया गया आदेश
सही है तो सत्ता की पालना उतनी ही अधिक सरल हो जाएगी अन्यथा
नहीं।

2. एकरूपता :-

        
विचारों और आदर्शों की एकरूपता सत्ता
का महत्वपूर्ण आधार है। यदि सत्ताधारक व अधीनस्थ के विचारों और आदर्शों में एकरुपता है तो स्वत: ही आज्ञा पालन की स्थिति पैदा हो जाती है।

3. लोकहित :-

        
यदि सरकार लोक हित में कार्य करती
हैं और नियम-कानून बनाती हैं तो जनता उन कार्यों, नियमों  और
कानूनों का अनुसरण बेहिचक करती है। जैसे कर जमा कराना। लोग कर इसलिए जमा कराते हैं क्योंकि
इसी कर से सरकार लोकहित के कार्य चलाती हैं और योजनाएं बनाती है। इसी प्रकार हम यातायात के नियमों का भी पालन करते हैं
क्योंकि इसमें जनता की सुरक्षा का हित छुपा है।

4. दबाव :-

           प्रत्येक व्यवस्था में कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो केवल दमन और दबाव की भाषा ही समझते हैं अर्थात लातों के बूत बातों से नहीं, लातों से ही मानते हैं।

 

सत्ता के रूप :-

              प्रमुख समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने सत्ता के निम्नलिखित तीन रूप बताए
हैं :-

1. परंपरागत सत्ता :-

           इस प्रकार की सत्ता पालन का आधार समाज में स्थापित परंपराएं होती हैं। जो व्यक्ति वंश व परंपरा के आधार पर सत्ता का प्रयोग
करता है, सत्ता उसी के पास बनी रहती
हैं। जैसे हम अपने घरों में माता-पिता और वृद्धजनों की आज्ञा का पालन परंपरागत
सत्ता के आधार पर ही करते हैं।

2. करिश्माई सत्ता :-

            यह सत्ता किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत गुणों और चमत्कारों पर आधारित होती
हैं। इसमें जनता उस व्यक्ति के इशारों पर बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए
तत्पर रहती हैं। जैसे महात्मा गांधी, नेल्सन मंडेला, मोदी आदि।

    
 नरेंद्र मोदी के
चमत्कारिक व्यक्तित्व से प्रभावित होकर जनता ने नोटबंदी जैसी योजना को सफल बनाया था।

3. कानूनी तर्कसंगत सत्ता :-

            इस प्रकार की सत्ता का आधार व्यक्तित्व न होकर पद होता है अर्थात व्यक्ति जो पद धारण करता है उसमें निहित सत्ता
के आधार पर सत्ता का प्रयोग करता है। जैसे कलेक्टर की
सत्ता, प्रधानाचार्य की सत्ता, शिक्षक की सत्ता आदि।

        
 जो व्यक्ति कानूनी
सत्ता का प्रयोग कर रहा है और उसका व्यक्तित्व चमत्कारिक है तो वह असीमित सत्ता का प्रयोग कर सकता है।

जैसे प्रधानमंत्री की सत्ता कानूनन सभी में समान है परंतु नेहरू, इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेई आदि प्रधानमंत्रियों
ने अन्य प्रधानमंत्रियों की तुलना में अत्यधिक सत्ता का प्रयोग किया है क्योंकि इन प्रधानमंत्रियों का व्यक्तित्व चमत्कारिक था।

 

वैधता

वैधता अंग्रेजी शब्द Legitimacy का हिंदी पर्याय है जो लैटिन Legitimus शब्द से बना है जिसका अर्थ है वैधानिक।

 वैधता की अवधारणा का
इतिहास
:-

 

प्राचीन काल :-

           भारतीय प्राचीन विचारकों ने राजा के शासन को उसके द्वारा किए गए प्रजा-पालन व जन कल्याण के कार्यों द्वारा वैधता प्रदान की।

 यूनानी विचारकों में प्लेटो
ने न्याय सिद्धांत द्वारा और अरस्तू ने संवैधानिक शासन द्वारा शासक की वैधता को सिद्ध
करने का प्रयास किया।

 मध्यकाल :-

            मध्यकाल में राज्य के दैवी उत्पति सिद्धांत को राज्य की वैधता
का आधार माना। लॉक, हॉब्स और रूसो
ने दैवी उत्पति सिद्धान्त की जगह लोगों
की सहमति को राज्य
की वैधता का आधार माना।

आधुनिक काल :-

              आधुनिक काल में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में जनता की सहभागिता को राज्य
की वैधता का प्रमाण माना जाता है।

वैधता उस कारण की ओर संकेत करती हैं जिसके कारण
हम किसी सत्ता को स्वीकार करते हैं अर्थात वैधता वह सहमति हैं जो लोगों द्वारा
राजनीतिक व्यवस्थाओं को प्रदान की जाती है।

 

वैधता के प्राप्ति
के साधन
:-

           मतदान, जनमत, संचार के साधन, राष्ट्रवाद आदि वे साधन है जिनके माध्यम से राज्य वैधता प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।

 

 वैधता का संकट :-

                    प्रत्येक राजनीति व्यवस्था को अपनी वैधता बनाए रखने के लिए प्रयत्न
करने होते हैं क्योंकि राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों में निरंतर परिवर्तन होता रहता है। यदि राजनीतिक व्यवस्था इन परिवर्तनों के अनुरूप ढल जाती है तो उनकी वैधता बनी रह जाती हैं। यदि राजनीतिक व्यवस्था इन परिवर्तनों के
अनुरूप ढल नहीं पाती है तो उनकी वैधता पर संकट आ जाता है।

जैसे प्राचीन काल की राजतंत्रीय व्यवस्था
में लोकतंत्रीय तत्वों का उदय होने पर जिन व्यवस्थाओं ने स्वयं को लोकतंत्रीय तत्वों के अनुरूप ढाल लिया
यानी लोकतंत्र की स्थापना कर ली उनकी वैधता यथावत बनी रही। जबकि साम्यवादी व्यवस्था स्वयं को लोकतंत्रीय तत्वों के अनुरूप ढाल नहीं पाई, अतः वर्तमान में इसकी वैधता न के बराबर है।

 इसी प्रकार
जब परंपरागत संस्थाएं व समूह नवीन व्यवस्थाओं और विचारों को स्वीकार कर लेते हैं तो
उनकी वैधता बनी रहती है अन्यथा उनकी वैधता में बाधा पहुंचेगी।

 

शक्ति, सत्ता और वैधता में अन्तर्सम्बन्ध

 

1. शक्ति के साथ वैधता जुड़कर सत्ता को अधिक प्रभावी बनाती है :-

             हम जानते हैं कि शक्ति के बिना समाज में शांति, व्यवस्था, न्याय व खुशहाली की स्थापना
नहीं की जा सकती है। परंतु केवल शक्ति का प्रयोग अधिक प्रभावी नहीं होता है। जब यही शक्ति वैधता से जुड़ जाती हैं तो सत्ता का रूप धारण कर लेती है और इस सत्तात्मक शक्ति को लोग
अपनी सहमति से स्वीकार करते हैं।

2. शक्ति, सत्ता और वैधता परस्पर पूरक :-

         
 जब शासक की शक्ति सत्ता का रूप ले लेती
है तो यह शक्ति शासक का अधिकार बन जाती है। चूँकि सत्ता में वैधता जुड़ी होती है इसलिए नागरिक
शासक की आज्ञा का पालन करते हैं और उनका कर्तव्य बन जाता है।

3. वैधता, शक्ति और सत्ता के मध्य कड़ी :-

            शासक अपनी शक्ति का प्रयोग कर लोगों को बाहरी रूप से नियंत्रित करते हैं परंतु जब शासक वैध शक्ति का प्रयोग करते हैं तो लोगों के हृदय में शासन करता है। केवल शक्ति अधिनायक तंत्र को प्रदर्शित करती हैं जबकि वैध शक्ति अर्थात सत्ता लोकतंत्र को प्रदर्शित करती हैं।

 इस प्रकार
वैधता, शक्ति और सत्ता को जोड़ने का
कार्य करती है।


L – 3  धर्म

 

धर्म को अंग्रेजी में Religion कहा जाता है जिसका अर्थ है आस्था, विश्वास या अपनी मान्यता। इसी प्रकार
धर्म संस्कृत भाषा के धारणात शब्द से बना है जिसमें घृ घात है जिसका आशय है
– धारण करना।

भारत में धर्म को कर्तव्य, अहिंसा, न्याय, सदाचार एवं सद्गुण के अर्थ
में मान्यता प्राप्त है अर्थात धर्म एक ऐसी एकीकृत प्रणाली है जो अपनी प्रथाओं और विश्वासों
से एक समुदाय विशेष को जोड़ता है। तदुपरांत यही समुदाय इस प्रणाली के आधार पर यह व्याख्या
करते हैं कि उनके लिए क्या पवित्र हैं और क्या अलौकिक हैं।

धर्मनिरपेक्षता :-

धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है किसी भी धर्म को मानने वाले के साथ भेदभाव
नहीं हो और सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखा जाए।

भारत में धर्म और धर्मनिरपेक्षता

भारतीय दर्शन मूल रूप से एकांतवादी हैं अर्थात प्राचीन काल में भारत
में मात्र एक ही धर्म सनातन धर्म प्रचलित था परंतु वर्तमान में हमारे देश में अनेक
धर्मों को मानने वाले हैं। साथ ही भारत में ईश्वर को मानने वाले भी हैं और नहीं मानने
वाले हैं । भारत में अनेक मत मतान्तर पाए जाते हैं जिसके कारण भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्षता
को संवैधानिक दर्जा दिया गया है और यह सर्वत्र स्वीकार है।

धर्म और नैतिकता

धर्म और नैतिकता में घनिष्ठ संबंध है। धर्म का मूल लक्ष्य मानव मात्र की
सेवा करना है। धर्म अच्छे आचरण, करुणा, शील व अहिंसा पर बल देता है। धर्म बुराइयों
से दूर रहने और सदाचार के मार्ग पर चलने की शिक्षा देता है। धर्म का काम भलाई करना
और उसकी स्तुति करना है। इस प्रकार स्पष्ट है कि धर्म नैतिकता पर ही आधारित होता है।

 

धर्म और राजनीति

 

धर्म का मूल
तत्व
:-

 

धर्म का मूल लक्ष्य मानव मात्र की सेवा करना है। सभी धर्म नैतिक मूल्यों
से परिपूर्ण होते हैं।

राजनीति का मूल तत्व :-

राजनीति का मूल तत्व है कि नीति के अनुसार राज करना और नीति वह जो नैतिक मूल्यों
और श्रेष्ठ धार्मिक मान्यताओं संपोषित हो।

धर्म और राजनीति में अन्तर्सम्बन्ध :-

राम मनोहर लोहिया के अनुसार धर्म और राजनीति के दायरे अलग अलग है परंतु
दोनों की जड़ें एक है। धर्म दीर्घकालीन राजनीति हैं जबकि राजनीति अल्पकालीन धर्म है
अर्थात धर्म और राजनीति दोनों की जड़े नैतिकता में ही निहित है।

निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर हम धर्म और राजनीति के अन्तर्सम्बन्धों को समझ
सकते हैं :-

1.    
विवेकपूर्ण संबंध :-

                                                             
i.     
यदि धर्म का राजनीति में समावेश विवेकपूर्ण
और तर्कसंगत हो तो यह कार्य मानव कल्याण की ओर अग्रसर होगा क्योंकि नीतिगत धर्म राजनीति
में सदैव विश्व शांति की स्थापना बल देता है ।

2.    
अविवेकपूर्ण संबंध :-

                  यदि राजनीति में धर्म का अविवेकपूर्ण समावेश किया जाए तो दोनों एक दूसरे
को भ्रष्ट बना देते हैं जो कि मानवता के लिए हानिकारक है। इसमें राज्य धर्म का दुरुपयोग
कर अपने धर्म के प्रसार व विस्तार की आड़ में साम्राज्य विस्तार करने लगते हैं जिससे
हजारों लोग मारे जाते हैं। वर्तमान में भले ही युद्ध नहीं हो रहे हो परंतु धार्मिक
श्रेष्ठता की होड़ में आतंकवादी गतिविधियां बढ़ रही है।

 

1.     मर्यादित संबंध:-

                     वर्तमान में धर्म और राजनीति को लगभग सभी देश पृथक-पृथक रखते हैं जिसका एकमात्र
उद्देश्य यह है कि धर्म और राज्य दोनों अपने-अपने मर्यादित क्षेत्र में रहकर एक-दूसरे
का सकारात्मक सहयोग करे न कि एक दूसरे के स्वार्थों की पूर्ति हेतु एक दूसरे का दुरुपयोग
करे। इस हेतु आज के युग की समस्त लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत
को अपनाया गया है।

धर्म और अहिंसा :-

                              धर्म और अहिंसा का अटूट संबंध है। दोनों के आधार तत्व है :- क्षमा, दया, करुणा, सत्य, कर्तव्यनिष्ठा व ईमानदारी है।
इन सभी तत्वों को विश्व के सभी देशों के धर्मो में न केवल स्वीकारा गया है बल्कि इनके
अभाव में किसी भी धर्म का गठन संभव नहीं है।

धर्म और राष्ट्रीयता :-

                                  हम चाहे किसी भी धर्म के अनुयायी हो और किसी भी पंथ का अनुसरण करते हो
परंतु राज्य सभी के लिए सर्वोपरि है। हमारा धर्म, मत, भाषा, रीति-रिवाज आदि राष्ट्र
से ऊपर नहीं हो सकता है। जब कोई व्यक्ति धर्म से विमुख होकर या धर्म की आड़ में अनैतिक
कार्य करता है तो वह न केवल समाज का विकास कार्य बाधित करता है बल्कि अंततः राष्ट्र
के विकास को बाधित करता है। ऐसे व्यक्ति समाज और राष्ट्र दोनों के लिए घातक होते हैं।

मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों से हम राष्ट्र की महत्ता को स्वीकार कर सकते
हैं –

” जो भरा नहीं भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं।

 वह हृदय नहीं पत्थर है, जिसमें
स्वदेश का प्यार नहीं

अर्थात राष्ट्र सर्वोपरि है। राष्ट्रधर्म ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है।

भारतीय सनातन संस्कृति में धर्म की संकल्पना:-

भारतीय सनातन संस्कृति के संदर्भ में हम धर्म की संकल्पना को निम्न बिंदुओं
के आधार पर समझ सकते हैं –

1.धर्म का अर्थ:-

संस्कृत में धर्म शब्द धारणात शब्द से बना है
जिसमें घृ घात है जिसका अर्थ है धारण करना।

2.मानवता धर्म :-

प्राचीन संस्कृति के अनुसार धर्म हमें केवल नियम कायदों में ही नहीं
बांधता है बल्कि इंसानियत का भाव रखने में भी मदद करता है। आज के आधुनिक परिप्रेक्ष्य
में इसे मानवता का धर्म कहा जाता है।

3.एकेश्वरवादी धर्म :-

” एकं सत विप्रा बहुधा वदंति। “

                ऋग्वेद के अनुसार अद्वितीय ब्रह्मा अर्थात सत्य एक ही है। केवल बुद्धिजीवियों
ने इसे समय समय पर अलग-अलग नामों से पुकारा है अर्थात ईश्वर एक है।

4.अहिंसा में विश्वास :-

” हिंसायाम दूयते या सा हिंदू ।

अर्थात जो मन,कर्म, वचन आदि से अपने आप हिंसा से दूर रखें और अपने कर्म
से दूसरों को कष्ट न दे, वे हिंदू हैं।

5.साधना पक्ष :-

भारत में धर्म का संबंध साधना पक्ष से है जिसका लक्ष्य मानव आत्मा का उत्थान है।

6. धर्म के लक्षण :-

                      याज्ञवल्क्य ने  धर्म के 9 लक्षण बताए है। यह हैं – अहिंसा, सत्य, अस्तेय
स्वच्छता, इंद्रिय-निग्रह, दान, संयम, दया व शांति। इसी प्रकार मनुस्मृति में धर्म के 10 लक्षण बताए गए हैं।

7. मानव कल्याण की भावना :-

                      भारतीय संस्कृति में यह कहा जाता है कि मैं न तो राज्य की कामना करता
हूं और न ही स्वर्ग और मोक्ष की।  बस यह कामना करता हूं कि मैं दुखी
प्राणियों के कष्टों को दूर कर सकूं अर्थात भारतीय धर्म में मानव के कल्याण की भावना
का समावेश है।

8.भिन्नभिन्न उपासना पद्धतियां और मत :-

                   सनातन धर्म वेदों पर आधारित है जिसमें भिन्न-भिन्न उपासना पद्धतियां, मत, संप्रदाय  व दर्शन  निहित है। यहां पर विभिन्न रूपों
में कई  देवी-देवताओं की पूजा की जाती है।

 

ईसाई धर्म
की अवधारणा

                  

  ईसाई धर्म की निम्नलिखित धार्मिक मान्यताएं है :-

1.      ईश्वर एक है।

2.      ईसाई धर्म  सिद्धांत में अहिंसा पर बल देते
हैं।

3.      विश्व में सर्वाधिक माने जाने वाला धर्म है।

4.      ईसाई धर्म में विभिन्न संप्रदाय हैं। जैसे कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट आदि।

5.      इसमें धर्म और राजनीति दोनों की समांतर सत्ता को स्वीकार किया गया है।

 

इस्लाम
की संकल्पना

                   

  इस्लाम दुनिया के नवीनतम धर्मों  में से एक है। इस्लाम धर्म का
प्रादुर्भाव 622 ईसवी में मोहम्मद पैगंबर ने किया था। मोहम्मद
साहब ने केवल दो अनुयायियों को लेकर इस्लाम की नींव रखी और आज लगभग 1.5 अरब लोग इस्लाम के अनुयायी है।

भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, ईरान, इराक, सऊदी अरब, इंडोनेशिया,
पश्चिमी एशिया और उत्तर पूर्वी अफ्रीका के देशों में इस्लाम का विस्तार है।

 

 इस्लाम की प्रमुख मान्यताएं :-

1.      इस्लाम धर्म व राजनीति में कोई भेद नहीं करता
है।

2.      इस्लाम एकेश्वरवाद में विश्वास करता है।

3.      मौलिक रूप से इस्लाम में अहिंसा और नैतिकता पर बल दिया गया है परंतु
वर्तमान में इस्लाम के नाम पर बढ़ रही धार्मिक कट्टरता विश्व के लिए घातक बन रही है

4.      इस्लामिक राज्यों  में लोकतंत्र का अभाव पाया जाता है।

5.      इस्लाम आध्यात्मिक व लौकिक में, अलौकिक व व्यवहारिक में और धर्म और
धर्मनिरपेक्षता में कोई भेद नहीं करता है।


L – 4  स्वतंत्रता और समानता

 

स्वतंत्रता का अर्थ :-

स्वतंत्रता शब्द अंग्रेजी के Liberty शब्द का हिंदी पर्याय है। Liberty लैटिन भाषा के Liber शब्द से बना है जिसका अर्थ है बंधनों का अभाव

स्वतंत्रता ( हिन्दी शब्द )

Liberty
(English )

Liber
( लैटिन शब्द )

बंधनों
का अभाव या मुक्ति।

यदि केवल बंधनों का अभाव ही स्वतंत्रता मानी
जाए तो सभी व्यक्ति बंधन मुक्त हो जाएंगे और परस्पर संघर्ष से नष्ट हो जाएंगे। इस स्थिति
में केवल सबल व्यक्ति ही जीवित या स्वतंत्र रह पाएंगे।

परंतु ऐसा नहीं है। स्वतंत्रता व्यक्ति की
अपनी इच्छा अनुसार कार्य करने की शक्ति का नाम है परंतु इस दौरान दूसरे व्यक्तियों
की इसी प्रकार की स्वतंत्रता में कोई बाधा नहीं पहुंचे हैं।

इस स्थिति में स्वतंत्रता के अर्थ के दो प्रकार
के विचार सामने आते हैं :- नकारात्मक
स्वतंत्रता और सकारात्मक स्वतंत्रता ।

A. नकारात्मक स्वतंत्रता :-

            नकारात्मक स्वतंत्रता के अनुसार प्रतिबंधों
का अभाव ही स्वतंत्रता है अर्थात व्यक्ति को मनमानी करने की छूट हो और राज्य को व्यक्ति
के निजी कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

इस विचारधारा के समर्थक हैं :- हॉब्स, रूसो, मिल आदि।

नकारात्मक स्वतंत्रता की मान्यताएं :-

1.      प्रतिबंधों का अभाव हो।

2.      राज्य का कार्यक्षेत्र सीमित होना चाहिए।

3.      कम से कम शासन करने वाली सरकार अच्छी सरकार
है।

4.      मानव विकास के लिए खुली प्रतियोगिता होनी चाहिए।

5.     
सरकार द्वारा समर्थित संरक्षण व्यक्तिगत हित में ठीक नहीं है। जैसे आरक्षण, सब्सिडी आदि।

B. सकारात्मक स्वतंत्रता :-

                   इस अवधारणा के अनुसार किए जाने योग्य कार्य
को करने की सुविधा स्वतंत्रता है। अर्थात व्यक्ति को उन कार्यों को करने की स्वतंत्रता
है जो अन्य की वैसी ही स्वतंत्रता में बाधा नहीं डाले।

इस विचारधारा के समर्थक हैं :- लास्की, हीगल, महात्मा गांधी, जॉन रॉल आदि।

 

सकरात्मक स्वतंत्रता की मान्यताएं :-

1.      स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त प्रतिबंध हो।

2.      स्वयं की स्वतंत्रता के अस्तित्व को स्वीकार
करने के लिए दूसरों की स्वतंत्रता को मान्यता देना आवश्यक हैं।

3.      राज्य के कानून की पालना में ही स्वतंत्रता
निहित है।

4.      समाज व व्यक्ति के हित परस्पर निर्भर हैं।

 

नकारात्मक स्वतंत्रता और सकारात्मक स्वतंत्रता
में अंतर

:-

नकारात्मक स्वतंत्रता

सकारात्मक स्वतंत्रता

1. प्रतिबंधों का अभाव

1.  युक्तियुक्त प्रतिबंध हो

2. राज्य का कार्यक्षेत्र सीमित हो

2. राज्य का कार्यक्षेत्र सीमित नहीं हो

 3. सरकार समर्थित संरक्षण का विरोधी

 3. सरकार समर्थित संरक्षण का समर्थन

4. मानव विकास के लिए खुली प्रतियोगिता का समर्थन

4. मानव विकास के लिए राज्य समर्थित प्रतियोगिता का समर्थन

                

स्वतंत्रता
के विविध रूप

 

1. प्राकृतिक स्वतंत्रता :-

                         मनुष्य को इस स्वतंत्रता की प्राप्ति किसी मानवीय संस्था से नहीं होती है बल्कि यह प्रकृति प्रदत है। यह स्वतंत्रता प्रकृति द्वारा मनुष्य को उसके जन्म के साथ ही मिल जाती
हैं। मनुष्य चाह कर भी इस सत्ता का हस्तांतरण अन्य व्यक्ति को नहीं कर सकता
है। यह स्वतंत्रता राज्य के अस्तित्व में आने से पूर्व
की अवस्था में विद्यमान थी और राज्य की उत्पत्ति के बाद धीरे-धीरे विलुप्त होती जा
रही हैं। जैसे जंगल में शेर की स्वतंत्रता।

इस संबंध में प्रसिद्ध विचारक रूसो का कथन इस प्रकार हैं – “मनुष्य स्वतंत्र रूप से पैदा होता है परंतु सर्वत्र बेड़ियों में जकड़ा रहता है।

2. व्यक्तिगत स्वतंत्रता :-

                          व्यक्तिगत या निजी स्वतंत्रता का आशय है कि व्यक्ति को उसके निजी जीवन
के समस्त कार्य करने की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए। इस अर्थ में व्यक्ति को वेशभूषा, खान-पान, धर्म,  रीति-रिवाज, पसंद, विचार आदि की स्वतंत्रता होनी चाहिए। व्यक्ति के व्यक्तिगत कार्यों पर
केवल समाज हित में ही बंधन लगाया जाना चाहिए।

 

3. नागरिक स्वतंत्रता :-

                           नागरिक स्वतंत्रता किसी व्यक्ति को देश के नागरिक होने की हैसियत से
मिलती हैं।
ऐसी स्वतंत्रता को उस देश का समाज स्वीकृति देता है और राज्य संरक्षण देता है। नागरिक स्वतंत्रता असीमित और निरंकुश नहीं होती हैं। देश के न्यायालय द्वारा इसकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है। नागरिक स्वतंत्रता के तहत व्यक्ति को अपने देश में कहीं भी घूमने फिरने, रोजगार करने, निवास
करने, विचार, अभिव्यक्ति व की स्वतंत्रता, शान्तिपूर्ण
सम्मलेन की स्वतंत्रता आदि शामिल है।

 

4. राजनीतिक स्वतंत्रता :-

     
                       राज्य के कार्यों में और राजनीतिक व्यवस्था में भागीदारी को राजनीतिक
स्वतंत्रता कहते हैं।
जैसे मतदान करने की स्वतंत्रता, चुनाव लड़ने की स्वतंत्रता, कोई भी सार्वजनिक पद प्राप्त
करने की स्वतंत्रता आदि।

5. आर्थिक स्वतंत्रता :-

         
                   आर्थिक स्वतंत्रता से आशय हैं कि प्रत्येक
व्यक्ति का आर्थिक स्तर ऐसा होना चाहिए जिसमें वह स्वाभिमान के तहत अपना और अपने परिवार का जीवन निर्वाह कर सके। आर्थिक स्वतंत्रता के तहत व्यक्ति को काम करने का, आराम व अवकाश का, व्यवसाय करने का, उद्योगों के नियंत्रण में भागीदारी का और वृद्धावस्था व असमर्थता
की स्थिति में आर्थिक सुरक्षा प्राप्त करने
का अधिकार हो।

6. धार्मिक स्वतंत्रता :-

                             व्यक्ति को उसके अंत:करण से किसी भी धर्म को मानने, उसमें आस्था रखने और उस धर्म
के अनुसार आचरण करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। यही धार्मिक स्वतंत्रता है।

7.  नैतिक स्वतंत्रता :-

                             व्यक्ति द्वारा नैतिक गुणों से युक्त होकर कार्य
करने की स्वतंत्रता ही नैतिक स्वतंत्रता है। यदि व्यक्ति नैतिक गुणों जैसे दया, शीलता, करुणा, प्रेम, स्नेह, सत्य, अहिंसा आदि से युक्त होकर कार्य करेगा तो ऐसे कार्य को करने की स्वतंत्रता नैतिक स्वतंत्रता कहलाती है।

8. सामाजिक स्वतंत्रता :-

                              मनुष्य के साथ जाति, वर्ग, लिंग, धर्म, नस्ल, रंग, ऊंच-नीच आदि के आधार पर किसी तरह का भेदभाव नहीं करना और सभी समाजों के साथ
समान व्यवहार करना ही सामाजिक स्वतंत्रता है।

9.  राष्ट्रीय स्वतंत्रता :-

                              जब राज्य के कार्य में अन्य देश का कोई हस्तक्षेप नहीं हो अर्थात राज्य
अपने कार्यक्षेत्र में संप्रभु हो तो ऐसे राज्य की  स्वतंत्रता राष्ट्रीय
स्वतंत्रता कहलाती है।

10.  संवैधानिक स्वतंत्रता :-

                              किसी भी नागरिक को यह स्वतंत्रता उसके देश
के संविधान से मिलती है और संविधान ऐसी स्वतंत्रताओं की रक्षा
की गारंटी देता है।
राज्य या शासन चाह कर भी इन स्वतंत्रताओं को कम नहीं कर सकता है। संवैधानिक स्वतंत्रता उस देश के संविधान में वर्णित होती हैं।

 

स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए आवश्यक शर्तें

                             स्वतंत्रता सभी के लिए आवश्यक है। प्रत्येक राज्य अपने नागरिकों के लिए संविधान प्रदत्त स्वतंत्रताएं
उपलब्ध करवाता है। फिर भी सभी को समान रूप से स्वतंत्रताएं नहीं मिल पाती हैं। स्वतंत्रताएं प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित शर्तें आवश्यक है :-

1.  निरन्तर जागरूकता :-

                           यदि व्यक्ति राज्य प्रदत्त अपनी स्वतंत्रताओं के उपयोग
हेतु जागरुक नहीं है तो वह कई स्वतन्त्रताओं का उपयोग करने
से वंचित रह जाता है।

2. लोकतांत्रिक व्यवस्था :-

                           राज्य और समाज में लोकतांत्रिक व्यवस्था होने से ही व्यक्ति अपनी स्वतंत्रताएं प्राप्त कर सकेगा। स्वतंत्रता प्राप्ति की प्रथम शर्त है – लोकतंत्र की स्थापना होना।

3. संविधानवाद :-    

                   नागरिकों की स्वतन्त्रताओं का उल्लेख उस
राज्य के संविधान में होना चाहिए तभी सरकारें लोगों को संविधान के अनुसार स्वतंत्रता देने हेतु बाध्य होगी अन्यथा सरकारें ना नुकुर करती रहेगी।

4. स्वतंत्र व निष्पक्ष न्यायपालिका :-

                           न्यायपालिका कार्यपालिका व व्यवस्थापिका से पृथक होनी चाहिए तभी वह निष्पक्ष और स्वतंत्र
न्याय कर पाएगी।

5. 
प्रेस की
स्वतंत्रता

:-

                          समाचार पत्र, मीडिया, सोशल मीडिया, प्रेस आदि को स्वतंत्रता मिलनी चाहिए ताकि वे लोगों के अधिकारों की मांग और स्वतन्त्रताओं के हनन का निष्पक्ष चित्रण कर सके।

                      इसी प्रकार नागरिकों का निडर व साहसी होना, अन्य नागरिकों का विशेषाधिकार नहीं होना, आर्थिक रूप से समतामूलक समाज की स्थापना होना, विधि का समान शासन होना आदि
स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए आवश्यक शर्ते हैं।

 

स्वतंत्रता के मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधाएं :-

                        राज्य के संविधान द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रताओं के उपयोग में निम्नलिखित बाधाएं प्रमुख रूप से सामने आती है :-

1. अशिक्षा :-

                      शिक्षा व्यक्ति को उसके संविधान प्रदत्त अधिकारों व स्वतन्त्रताओं का ज्ञान कराती हैं और उनका महत्व बताती हैं। अतः शिक्षा का अभाव स्वतंत्रता प्राप्ति के मार्ग की सर्वप्रमुख
बाधा है।

2. जागरूकता का अभाव :-

                        जब व्यक्ति अपनी स्वतंत्रताओं के प्रति जागरूक नहीं होंगे
तो अन्य व्यक्ति उनकी जागरूकता के अभाव का लाभ उठाकर उनके अधिकारों व स्वतन्त्रताओं का प्रयोग कर उनका शोषण करने लग जाएंगे।

3. गरीबी :-

                       गरीब व्यक्ति के पास संसाधनों का अभाव होता है। इस कारण उन्हें प्रदत्त स्वतंत्रताओं का वे उपयोग नहीं कर पाते हैं।

4. 
न्यायपालिका
के कार्यों में कार्यपालिका का हस्तक्षेप
:-

                     व्यक्ति की स्वतंत्रताओं का रक्षक न्यायपालिका को माना गया है। यदि कार्यपालिका न्यायपालिका के कार्यो में हस्तक्षेप करेगी तो व्यक्तियों की स्वतंत्रताओं की रक्षा नहीं हो पाएगी।

5. 
संविधान
में कानून के प्रति सम्मान का अभाव
:-

                   स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि सभी
नागरिक देश के संविधान और कानून का सम्मान करें। यदि नागरिकों में देश के संविधान और कानून के प्रति सम्मान का अभाव
रहेगा तो अराजकता की स्थिति पैदा हो जाएगी। जिससे व्यक्तियों की स्वतंत्रताएं खतरे
में पड़ जाएगी।

               उपरोक्त के अलावा कार्यपालिका का स्वेच्छाचारी आचरण, राष्ट्र विरोधी तत्व व आतंकवादी गतिविधियां आदि भी स्वतंत्रता प्राप्ति के मार्ग की प्रमुख बाधाएं हैं।

 

समानता

 

समानता का अर्थ :-

                      समानता से अभिप्राय ऐसी परिस्थितियों के अस्तित्व से हैं जिसमें सभी
व्यक्तियों को अपने विकास के समान अवसर मिले और जिनके द्वारा समाज में विद्यमान सामाजिक
व आर्थिक विषमताओं को दूर किया जा सके।

   
 लास्की के अनुसार, “समानता का अर्थ यह नहीं है कि सभी के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाए
और प्रत्येक व्यक्ति को एक समान वेतन दिया जाए। “

लास्की के अनुसार समानता है :-

1.      विशेष सुविधाओं का अभाव।

2.      सभी के लिए समान अवसरों की उपलब्धता।

3.      सभी की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति सर्वप्रथम।

4.      सामानों के साथ समान व्यवहार।

 समानता के आधारभूत तत्व :-

1.      समान लोगों के साथ समान व्यवहार।

2.      सभी को विकास के समान के अवसर।

3.      सभी लोगों के साथ समान आचरण व व्यवहार।

4.      मानवीय गरिमा और अधिकारों को समान संरक्षण।

5.      सामाजिक भेदभाव नहीं।

6.      सभी को समान महत्व।

 

 समानता के प्रकार

 

1. नागरिक समानता :-

                         एक ही देश के समस्त नागरिकों के साथ समान व्यवहार ही नागरिक समानता
है। भारत में संविधान के अनुच्छेद 14 द्वारा विधि के समक्ष समानता और विधि का समान संरक्षण द्वारा नागरिक समानता
का अधिकार दिया गया है।

2. 
राजनीतिक
समानता
:-

                        राज्य के सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के राज्य के कार्यों में
भाग लेने की समानता ही राजनीतिक समानता है। इसके तहत सभी को मतदान करने, चुनाव में खड़े होने, सार्वजनिक पद प्राप्त करने
के समान अवसर आदि की समानता देय हैं।

3. सामाजिक समानता :-

                       समाज में किसी भी व्यक्ति के साथ धर्म, जाति, वर्ण, लिंग, नस्ल आदि के आधार पर असमान व्यवहार न हो। भारत के संविधान के अनुच्छेद 15 द्वारा यह समानता स्थापित की गई है।

4.  आर्थिक समानता :-

                      राज्य सभी लोगों के लिए कार्य करने के समान अवसर उपलब्ध करवाये और सभी की न्यूनतम आवश्यकता की पूर्ति करें, यही आर्थिक समानता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 द्वारा लोक नियोजन में अवसर की समानता द्वारा आर्थिक समानता स्थापित करने
का प्रयास किया गया है। इसी प्रकार नीति निदेशक तत्व में
भी आर्थिक समानता पर बल दिया गया है।

5. 
सांस्कृतिक
समानता
:-

                     राज्य अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक वर्ग के साथ समान व्यवहार कर सभी की
भाषा, संस्कृति, लिपि आदि का समान संरक्षण करें, यही सांस्कृतिक समानता है।

6. 
कानूनी
समानता
:-

                    कानून के आधार पर किसी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं करना कानूनी समानता
है अर्थात प्रति व्यक्ति चाहे वह अमीर हो या गरीब, राजनेता हो या आम आदमी, उद्योगपति हो या सरकारी कर्मचारी कानून सभी के लिए समान है और सभी कानून
की नजर में समान है।

             इसी प्रकार अवसर की समानता, शिक्षा की समानता, प्राकृतिक समानता आदि समानता के अन्य प्रकार हैं।

 

स्वतंत्रता और समानता में संबंध

                  स्वतंत्रता एवं समानता के संबंधों को हम विभिन्न विचारकों के विचारों
के आधार पर निम्न दो भागों में पृथक कर सकते हैं :-

1. स्वतंत्रता एवं समानता परस्पर विरोधी है  :-

           इस मत के विचारक हैं – लार्ड एक्टन, फ्रीडमैन, मिचेल्स, परेटो आदि।

                          इन सभी विचारकों का मानना है कि समानता के विचार ने स्वतंत्रता की अवधारणा
को धूमिल कर दिया है। प्रकृति में सभी व्यक्ति समान नहीं होते हैं। इसलिए योग्य और अयोग्य व्यक्तियों के मध्य समानता स्थापित करना मूर्खतापूर्ण
कार्य हैं। यदि राज्य योग्य और अयोग्य व्यक्तियों के बीच समानता स्थापित करने
का प्रयास करेगा तो योग्य व्यक्तियों की स्वतंत्रता का हनन
होगा। अर्थात समानता स्थापित करने की दौड़ में स्वतंत्रता का हनन होता है। इसी
प्रकार  सभी व्यक्ति को समान रूप से स्वतंत्रता दे दी जाये तो समतामूलक समाज की स्थापना
नहीं की जा सकेगी। इस प्रकार स्पष्ट है कि स्वतंत्रता और समानता परस्पर विरोधी अवधारणा है।

2. स्वतंत्रता एवं समानता परस्पर पूरक हैं :-

         
इस मत के विचारक हैं – रूसो, बार्कर, लास्की, पोलार्ड, महात्मा गांधी आदि ।

रूसो के अनुसार, ” समानता के बिना स्वतंत्रता जीवित नहीं रह सकती हैं। “

 पोलार्ड के
अनुसार, ”
स्वतंत्रता की समस्या का एक ही समाधान है और वह है समानता।

              उपर्युक्त दोनों कथनों से स्पष्ट है कि स्वतंत्रता और
समानता परस्पर पूरक है। इसे निम्न प्रकार और अधिक स्पष्ट
किया जा सकता है
:-

1.     
राजनीतिक समानता
के बिना स्वतंत्रता अर्थहीन
है।

2.     
नागरिक समानता
के अभाव में व्यक्ति अपनी
स्वतंत्रताओं का उपयोग नहीं कर पाएगा।

3.     
सामाजिक समानता
के अभाव में स्वतंत्रता कुछ लोगों का विशेषाधिकार बनकर रह जाएगी।

4.     
आर्थिक समानता
के अभाव में सभी प्रकार की समानता और स्वतंत्रता निरर्थक है।