CLASS 12 HISTIRY LESSON 1 भारत का वैभवपूर्ण अतीत (BHARAT KA VAIBHAVPURN ATIT )

by | Apr 18, 2021 | CLASS 12, E CONTENT, MOCK TEST, REET, STUDENT CORNER



CLASS 12 HISTORY CHAP 1 1
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CLASS 12 HISTIRY LESSON 1 भारत का वैभवपूर्ण अतीत (BHARAT KA VAIBHAVPURN ATIT )

पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

 बहुचयनात्मक प्रश्न

भारत का वैभवपूर्ण अतीत प्रश्न 1.
किस वेद में पृथ्वी को भारत माता के रूप में स्वीकार किया गया है?
(अ) अथर्ववेद
(ब) सामवेद
(स) यजुर्वेद
(द) ऋग्वेद।
उत्तर: (अ) अथर्ववेद

प्रश्न 2. ‘मिडास ऑफ गोल्ड’ पुस्तक के लेखक कौन थे?
(अ) मैक्समूलर
(ब)डी. डी. कौशाम्बी
(स) अल मसूदी
(द) अल्बेरुनी।
उत्तर: (स) अल मसूदी

 12 प्रश्न 3. विक्रम सम्वत् की शुरूआत कब हुई?
(अ) 78 ई. पूर्व.
(ब) 57 ई. पूर्व.
(स) 78 ई.
(द) 130 ई.।
उत्तर: (ब) 57 ई. पूर्व.

प्रश्न 4. निम्नांकित में से कौन – सा वेदांग नहीं है?
(अ) शिक्षा
(ब) व्याकरण
(स) ज्योतिष
(द) सूत्र।
उत्तर: (द) सूत्र।

 प्रश्न 5. प्राचीन भारत में नौका शास्त्र के ग्रन्थ ‘युक्तिकल्पतरु’ के लेखक का नाम था?
(अ) राजा भोज
(ब) गौतमी पुत्र सातकर्णी
(स) भास्कराचार्य
(द) बाणभट्टं।
उत्तर: (अ) राजा भोज

प्रश्न 6. ऋग्वेदिक आर्यों को भौगोलिक क्षेत्र था?
(अ) ईरान
(ब) अफगानिस्तान
(स) दो आब प्रदेश
(द) सप्तसैन्धव।
उत्तर: (द) सप्तसैन्धव

प्रश्न 7.सिन्धु सरस्वती सभ्यता में विशाल स्टेडियम के अवशेष कहाँ प्राप्त हुए हैं?
(अ) लोथल
(ब) राखीगढ़ी
(स) धौलावीरा
(द) मोहनजोदड़ो।
उत्तर: (स) धौलावीरा

प्रश्न 8. महाजनपद काल में जिस स्थान पर सभा की बैठक होती थी उस स्थान को कहते थे?
(अ) समिति
(ब) सभा
(स) आसन्न प्रज्ञापक
(द) संस्थागार।
उत्तर: (द) संस्थागार।

अति लघूत्तरात्मक प्रश्नउत्तर

प्रश्न 1. लुप्त सरस्वती नदी शोध अभियान किन पुरातत्ववेत्ता ने प्रारम्भ किया था?
उत्तर: लुप्त सरस्वती नदी शोध अभियान प्रसिद्ध पुरातत्वविद् डॉ. वी. एस. वाकणकर ने प्रारम्भ किया था।

प्रश्न 2. दक्षिणी पूर्वी एशिया में भारतीय संस्कृति का प्रसार किन – किन देशों में हुआ?
उत्तर: दक्षिणी पूर्वी एशिया में भारतीय संस्कृति का प्रसार कम्बोडिया, जावा, सुमात्रा, मलाया, श्याम, चम्पा, बर्मा, लंका आदि देशों में हुआ।

प्रश्न 3.अंगकोरवाट के स्मारक किस देश में स्थित हैं?
उत्तर: अंगकोरवाट के स्मारक कम्बोडिया में स्थित हैं।

प्रश्न 4. नवपाषाण युग की प्रमुख विशेषताएँ बताइये।
उत्तर: नवपाषाण युग में मानव पत्थर के उपकरणों की सहायता से कृषि व पशुपालन कार्य करने लगा था।

प्रश्न 5. सिन्धु सरस्वती सभ्यता के लोग किस धातु से परिचित थे?
उत्तर: सिन्धु सरस्वती सभ्यता के लोग ताँबे की धातु से परिचित थे।

प्रश्न 6. सिन्धु सरस्वती सभ्यता के अधिकांश लेख किस पर मिलते हैं?
उत्तर: सिन्धु सरस्वती सभ्यता के अधिकांश लेख मुहरों पर मिलते हैं।

प्रश्न 7. आरण्यक ग्रंथों में किस विषय को प्रतिपादित किया गया है?
उत्तर: आरण्यक ग्रंथों में प्रत्येक वेद की संहिता को प्रतिपादित किया है।

 प्रश्न 8. त्रिपिटक क्या हैं?
उत्तर: त्रिपिटक बौद्ध साहित्य के सबसे प्राचीन ग्रन्थ हैं, ये तीन हैं-सुत्तपिटक, विनयपिटक, अभिधम्मपिटक।

प्रश्न 9. दस राज्ञ युद्ध किन-किन के मध्य लड़ा गया?
उत्तर: दस राज्ञ युद्ध भरत जन के राजा सुदास तथा दस जनों के राजाओं के मध्य लड़ा गया जिसमें सुदास की विजय हुई थी।

प्रश्न 10. पंच जन में कौन-कौन से जन सम्मिलित थे?
उत्तर: पंच जन में-अणु, यदु, तुर्वस, पुरु एवं दुह्य सम्मिलित थे।

प्रश्न 11. तीन ब्राह्मण ग्रंथों के नाम बताइए।
उत्तर: तीन ब्राह्मण ग्रंथ हैं-ऐतरेय, कौषितकी, शतपथ।

प्रश्न 12. प्राचीन भारत में गणित के क्षेत्र में योगदान करने वाले दो विद्वानों के नाम बताइये।
उत्तर: प्राचीन भारत में गणित के क्षेत्र में योगदान करने वाले दो विद्वान-

  1. भास्कराचार्य एवं
  2. बोधायन थे।

प्रश्न 13. भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में कणाद ने किस पद्धति का आविष्कार किया?
उत्तर: भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में कणाद ने पदार्थ व उसके संघटक तत्व व गुण का सिद्धान्त प्रतिपादित किया।

प्रश्न 14. 16 संस्कारों के नाम बताइए।
उत्तर: 16 संस्कारों के नाम इस प्रकार हैं।

1. गर्भाधान, 2. पुंसवन, 3. सीमन्नतोनयन, 4. जातकर्म, 5. नामकरण, 6. निष्क्रमण, 7. अन्नप्राशन, 8. चूड़ाकर्म, 9. कर्णवेध, 10. विद्यारम्भ, 11. उपनयन, 12. वेदारम्भ, 13. केशान्त, 14. समावर्तन, 15. विवाह, 16. अन्त्येष्टि।

प्रश्न 15. चार पुरुषार्थ क्या है?
उत्तर: जिन आदर्शों का अनुसरण मनुष्य को अपने जीवन में करना चाहिए। वे पुरुषार्थ हैं, ये चार हैं-

  1. धर्म
  2. अर्थ
  3. काम व
  4. मोक्ष।

प्रश्न 16. आश्रम व्यवस्था क्या है?
उत्तर: व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन को एक आदर्श परिधि में व्यक्त करते हुए उसके जीवन की गति को चार आश्रमों में विभाजित किया गया। आश्रम व्यवस्था के अन्तर्गत व्यक्ति जीवन के इन चार सोपानों-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व संन्यास आश्रम को पार करते हुए अपने जीवन के चरम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त करता है।

प्रश्न 17. दिल्ली में लौह स्तम्भ कहाँ स्थित है?
उत्तर: दिल्ली में लौह स्तम्भ मेहरौली में स्थित है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. शैलचित्र कला के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर: आदि मानव गुफाओं, चट्टानों में बने प्राकृतिक आश्रय स्थलों जिन्हें शैलाश्रय कहा जाता है, में निवास करता था। शैलाश्रय की छतों, दीवारों पर तत्कालीन मानव द्वारा जीवन के विभिन्न पक्षों से सम्बन्धित चित्रांकन किया गया है जिन्हें शैलचित्र कहते हैं। मानव ने जीवन के विभिन्न पक्षों की अभिव्यक्ति चित्रों के माध्यम से की है। इनसे प्रारम्भिक मानव के सांस्कृतिक सामाजिक व धार्मिक जीवन की जानकारी मिलती है।

दक्षिण पूर्वी राजस्थान, मध्य प्रदेश के विभिन्न स्थानों; जैसे- भीमबेटका, पंचमढ़ी, भोपाल, होशंगाबाद, विदिशा, सागर, उत्तर प्रदेश में मिर्जापुर, राजस्थान में चम्बल नदी घाटी क्षेत्र, बाराँ, आलनियाँ, विलासगढ़, दर्रा, रावतभाटा, कपिल धारा, बूंदी व विराट नगर (जयपुर), हरसौरा (अलवर) व समधा आदि स्थानों पर शैलाश्रयों में शैलचित्र प्राप्त हुए हैं जो तत्कालीन मानवजीवन के विभिन्न पक्षों को उजागर करते हैं तथा हमें उस समय की संस्कृति का बोध कराते हैं।

प्रश्न 2. प्राचीन समाज व धर्म में त्रिऋण वे यज्ञ व्यवस्था को समझाइए।
उत्तर: प्राचीन भारतीय समाज में ऋण तथा यज्ञ का महत्वपूर्ण स्थान था। ऋग्वेद में लौकिक एवं पारलौकिक दोनों। संदर्भो में मनुष्य के ऋणों की चर्चा की गई है। इन ऋणों से मुक्त होने पर ही मुक्ति सम्भव है ये प्रमुख ऋण हैं

  1. पितृ ऋण – सन्तानोत्पत्ति के द्वारा मानव जाति की निरन्तरता बनाकर हम पितृ ऋण की पूर्ति कर सकते हैं।
  2. ऋषि ऋण – ऋषियों से प्राप्त ज्ञान और परम्परा का संवर्द्धन करके हम ऋषि ऋण की पूर्ति कर सकते हैं।
  3. देव ऋण – देवताओं के प्रति हमारा दायित्व जिसे यज्ञादि से पूर्ण किया जाता है।

यज्ञ व्यवस्था: भारतीय संस्कृति में प्रत्येक गृहस्थ के लिए पाँच महायज्ञों का भी प्रावधान किया गया है

(क) ब्रह्म या ऋषि यज्ञ – ऋषियों के विचारों का अनुशीलन करना।
(ख) देव यज्ञ – देवताओं की यज्ञ द्वारा स्तुति, पूजा करना, प्रार्थना करना, वन्दना करना।
(ग) पितृ यज्ञ – माता-पिता की सेवा करना तथा गुरु, आचार्य एवं वृद्धजनों का सम्मान वे सेवा करना।
(घ) भूत यज्ञ – विभिन्न प्राणियों को भोजन कराकर संतुष्ट करना व अतिथियों की सेवा करना।
(ङ) नृप यज्ञ – सम्पूर्ण मानव मात्र के कल्याण के लिए कार्य करना।

प्रश्न 3. महाजनपद से क्या तात्पर्य है? 16 महाजनपदों के नाम लिखिए।
उत्तर: ऋग्वैदिक काल में जन (कबीला) का स्थायी भौगोलिक आधार नहीं था परन्तु उत्तर वैदिक काल तक आते-आते कृषि क्रान्ति के परिणामस्वरूप स्थायी जीवन को बढ़ावा मिला तथा जन बसना शुरू हो गये, जिन्हें जनपद कहा गया। बुद्ध के काल तक जनपदों का पूर्ण विकास हो चुका था तथा भू-विस्तार के लिए आपसी संघर्ष होने लगा। निर्बल राज्य शक्तिशाली राज्यों में विलीन हो गये और जनपदों ने महाजनपदों का रूप ले लिया।

ये 16 महाजनपद थे:
अंग, मगध, काशी, कोसल, वज्जि संघ, मल्ल, चेदि, वत्स, कुरु, पांचाल, मत्स्य, सूरसेन, अश्मक, अवन्ति, गान्धार तथा कम्बोज।

प्रश्न 4. सभा व समिति क्या थी ?
उत्तर: वैदिक युग में राजतंत्रीय शासन प्रणाली स्थापित थी। राजा राज्य की सर्वोच्च अधिकारी होता था। राजा को शासन कार्य में सहायता देने के लिए जनता द्वारा निर्वाचित ‘सभा’ और ‘समिति’ नामक दो परिषदें होती थीं। ये परिषदें राजा की निरंकुशता पर अंकुश लगाने वाली संस्थाएँ थीं। समिति एक आम जन प्रतिनिधि सभा होती थी जिसमें महत्वपूर्ण राजनैतिक एवं सामाजिक विषयों पर विचार होता था। समिति की बैठकों में राजा भी भाग लेता था। समिति की तुलना में सभी छोटी संस्था थी जिसमें ज्येष्ठ एवं विशिष्ट व्यक्ति ही भाग लेते थे। सभा अनुभवी वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित व्यक्तियों की संस्था थी जो राजा को परामर्श एवं न्याय कार्य में सहयोग करती थी।

प्रश्न 5. उपनिषदों में किन विषयों का प्रतिपादन किया गया है?
उत्तर: उपनिषद् भारतीय आध्यात्मिक चिन्तन के मूलाधार हैं। उपनिषद् समस्त भारतीय दर्शन के मूल स्रोत हैं चाहे वह वेदान्त हो या सांख्य या जैन धर्म या बौद्ध धर्म उपनिषदों को भारतीय सभ्यता का अमूल्य धरोहर माना जाता है। उपनिषदों में ऋषियों द्वारा खोजे गये उत्तर हैं जिनमें निराकार, निर्विकार असीम अपार को अंतदृष्टि से समझने और परिभाषित करने की अदम्य आकांक्षा के लेखबद्ध विवरण मिलते हैं। उपनिषद् चिन्तनशील एवं कल्पनाशील मनीषियों की दार्शनिक रचनाएँ हैं। उपनिषदों में वास्तविक वैदिक दर्शन का सार है। उपनिषद् में आत्म और अनात्म तत्वों का निरूपण किया गया है जो वेद के मौलिक रहस्यों का प्रतिपादन करता है।

प्रश्न 6. भारतीय इतिहास की जानकारी में विदेशी साहित्य का योगदान बताइए।
उत्तर: प्राचीनकाल से ही भारत की सांस्कृतिक एवं आर्थिक विरासत ने विश्व के देशों को आकर्षित किया है। भारत की राजनीति, धर्म व दर्शन के अध्ययन हेतु भी कई विदेशी यात्री भारत आये और उन्होंने भारत के सम्बन्ध में पर्याप्त विवरण दिया इनमें प्रमुख थे

  1. यूनानी राजदूत मेगस्थनीज जो चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में भारत आया। इसने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में मौर्य प्रशासन, समाज व आर्थिक स्थिति के विषय में विस्तार से वर्णन किया है। इसके अतिरिक्त अन्य यूनानी लेखकों टेसियंस, हेरोडोटस, निर्याकस, ऐरिस्टोब्युलस, आनेक्रिटस, स्ट्रेबो, ऐरियन आदि लेखक भी प्रमुख हैं।
  2. चीनी यात्रियों में फाह्यान, सुंगयन, ह्वेनसांग एवं इत्सिग का वृत्तान्त अत्यन्त महत्वपूर्ण है। ये चीनी यात्री जिस शासक के शासनकाल में भारत आये उनके ग्रंथ तत्कालीन शासन व्यवस्था को उजागर करते हैं।
  3. तिब्बती वृत्तान्तों में तारानाथ द्वारा रचित कंग्यूर व तंग्यूर ग्रंथ, मसूदी का मिडास ऑफ गोल्ड’ अत्यन्त प्रसिद्ध हैं।
  4. अरबी लेखकों में मसूदी ने अपनी पुस्तक ‘मिडास ऑफ गोल्ड’ में भारत का विवरण दिया है। सुलेमान नवी की पुस्तक ‘सिलसिलात उल तवारीख’ में पाल प्रतिहार शासकों का विवरण मिलता है।
  5. अल्बेरुनी की सबसे महत्वपूर्ण कृति ‘तारीख उल हिन्द’ में भारतीय समाज व संस्कृति की विस्तृत जानकारी मिलती है।

प्रश्न 7. भारतीय इतिहास की जानकारी के लिए सिक्कों का महत्व बताइए।
उत्तर: प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी में सिक्कों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सिक्कों से शासकों के राज्य विस्तार, उनके आर्थिक स्तर, धार्मिक विश्वास, कला, विदेशी व्यापार आदि की जानकारी मिलती है। सबसे पहले प्राप्त होने वाले सिक्के ताँबे तथा चाँदी के हैं। इन पर केवल चित्र है, इन्हें आहत सिक्के कहा जाता है। सिक्कों पर राजा का नाम, राज चिन्ह, धर्म चिन्ह व तिथि अंकित होती थी। मौर्यकालीन, कुषाणकालीन तथा गुप्तकालीन सिक्के तत्कालिक शासन व्यवस्था की जानकारी के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। सिक्कों से हमें निम्नलिखित वस्तु स्थितियों के सम्बन्ध में जानकारियाँ मिलती हैं-

  1. शासकों के नाम
  2. तिथिक्रम निर्धारण
  3. शासकों के चित्र
  4. वंश परम्परा
  5. शासकों के गौरवपूर्ण कार्य
  6. धार्मिक विश्वास की जानकारी
  7. कला की जानकारी
  8. शासकों की रुचियों का ज्ञान
  9. व्यापार व आर्थिक स्तर की जानकारी
  10. साम्राज्य की सीमाओं का ज्ञान
  11. नवीन तथ्यों का उद्घाटन।

प्रश्न 8. वेदांग साहित्य क्या है? स्पष्ट करिए।
उत्तर:
वैदिक साहित्य को भली-भाँति समझने के लिए वेदांग साहित्य की रचना की गई। वेदांग हिन्दू धर्म ग्रंथ है। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द और निरुक्त-ये छः वेदांग हैं।

  1. शिक्षा – इसमें वेद मंत्रों के उच्चारण करने की विधि है।
  2. कल्प – वेदों के किस मंत्र का प्रयोग किस कर्म में करना चाहिए इसके बारे में कल्प में बताया गया है। इसकी तीन शाखायें हैं-स्रोतसूत्र, ग्रहसूत्र और धर्मसूत्रं हैं।
  3. व्याकरण – इससे प्रकृति और प्रत्यय आदि के योग से शब्दों की सिद्धि और उदात्त-अनुदात्त तथा स्वरित स्वरों की स्थिति का बोध होता है।
  4. निरुक्त – वेदों में जिन शब्दों का प्रयोग जिन अर्थों में किया गया है उनके उन अर्थों का निश्चयात्मक उल्लेख निरुक्त में किया गया है।
  5. ज्योतिष – इससे वैदिक यज्ञों एवं अनुष्ठानों का समय ज्ञात होता है। यहाँ ज्योतिष से अर्थ वेदांग ज्योतिष से है।
  6. छन्द – वेदों में प्रयुक्त गायत्री उष्णिक आदि छन्दों की रचना का ज्ञान छन्दशास्त्र से होता है।

छन्द को वेदों का पाद, कल्पे को हाथ, ज्योतिष को नेत्र, निरुक्त को कान, शिक्षा को नाक और व्याकरण को मुख कहा गया है।

प्रश्न 9. सिन्धु स्थापत्य कला की प्रमुख विशेषताएँ बताइये।
उत्तर: 
सिन्धु सभ्यता एवं संस्कृति विशुद्ध भारतीय है। इस सभ्यता का उद्देश्य रूप और प्रयोजन मौलिक एवं स्वदेशी है। उत्खनन द्वारा जो पुरातात्विक सामग्री प्राप्त हुई है उसके आधार पर सिन्धु सभ्यता की जो विशेषताएँ उभरकर आयीं वे निम्नलिखित हैं

  1. व्यवस्थित नगर नियोजन सिन्धु सभ्यता की प्रमुख विशेषता है। हड़प्पा मोहनजोदड़ो व अन्य प्रमुख पुरास्थलों से प्राप्त अवशेषों को देखने से स्पष्ट होता है कि इस सभ्यता के निर्माता नगर निर्माण की कला से परिचित थे।
  2. मकानों आदि से गन्दा जल निकालने की यहाँ उत्तम व्यवस्था थी। प्रत्येक सड़क और गली के दोनों ओर पक्की ढुकी. हुई नालियाँ बनी हुई मिली हैं। प्रत्येक छोटी नाली बड़ी नाली में और बड़ी नालियाँ नाले में जाकर मिलती थी। इस प्रकार नगर का सारा गन्दा जल नगर से बाहर जाता था।
  3. मोहनजोदड़ो से एक विशाल स्नानागार मिला है जिसका आकार 39 × 23 × 8 फीट है।
  4. हड़प्पा व मोहनजोदडों से विशाल अन्नागार भी प्राप्त हुए हैं जिनका आकार क्रमशः 55 × 43 मीटर तथा 45.71 x 15.23 मीटर है।
  5. धौलावीरा से 16 छोटे – बड़े जलाशय प्राप्त हुए हैं जिनसे जल संग्रहण व्यवस्था की जानकारी मिलती है।
  6. लोथल से पक्की ईंटों का डॉक यार्ड मिला है जिसका आकार 214 x 36 मीटर है तथा गहराई 3.3 मी. है। इसके उत्तरी दीवार में 12 मीटर चौड़ा प्रवेश द्वार था जिससे जहाज आते थे।

 प्रश्न 10. आरण्यक साहित्य क्या है?
उत्तर:
संसार के प्राचीनतम ग्रंथ वेद हैं। वेदों के द्वारा हमें सम्पूर्ण आर्य सभ्यता व संस्कृति की जानकारी मिलती है। वेदों की संख्या चार है-ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद वे अथर्ववेद। प्रत्येक वेद के चार भाग-संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् हैं। आरण्यक ग्रंथों की रचना ऋषियों द्वारा वनों में की गयी है। इन ग्रंथों में दार्शनिक विषयों का विवरण मिलता है। इनमें मुख्य रूप से आत्मविद्या और रहस्यात्मक विषयों के विवरण हैं। इनकी भाषा वैदिक संस्कृत है। ये वेद मंत्र तथा ब्राह्मण का सम्मिलित अभिधान है।

प्रश्न 11. सिन्धु सरस्वती कालीन प्रमुख उद्योगों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:सिन्धु निवासी विभिन्न शिल्प कलाओं एवं उद्योगों से परिचित थे। इनका औद्योगिक जीवन उन्नत था। सिन्धु सभ्यता में सूत कातना, सूती वस्त्रों की बुनाई, आभूषण निर्माण, बढ़ईगिरी, लुहार का कार्य, कुम्भकार का कार्य आदि व्यवसाय विकसित थे। यहाँ से उत्खनन में मछली पकड़ने के काँटे, आरियाँ, तलवारें, चाकू, भाले, बर्तन आदि प्राप्त हुए हैं। अतः स्पष्ट है कि यहाँ धातु उद्योग विकसित था। सिन्धु सभ्यता के लोग बर्तन बनाने की कला से भी परिचित थे। मनका निर्माण उद्योग भी विकसित होने के प्रमाण मिलते हैं। ये मनके सोने-चाँदी, ताँबे, पीली मिट्टी, शैलखड़ी, पत्थर, सीपी, शंख आदि के बनाये जाते थे। इस सभ्यता से लगभग 2500 मोहरें मिली हैं जो अधिकांशतः सेलखड़ी से बनी हैं।

प्रश्न 12.सिन्धु सरस्वती सभ्यता की मुहर निर्माण कला की विशेषताएँ बताइये।
उत्तर:सिन्धु सरस्वती सभ्यता में उत्खनन से लगभग 2500 मुहरें प्राप्त हुई हैं। ये लाख, पत्थर तथा चमड़े आदि की बनी हुई हैं। यहाँ से प्राप्त मुहरें मुद्रा निर्माण कला के समुन्नत होने का संकेत देती हैं। इन मुहरों पर पशुओं (एक सींग का पशु, बाघ, हाथी, साँड, गैंडा), पेड़-पौधे, मानव आकृतियाँ आदि के चित्र हैं जो हमें उस समय की मानव गतिविधियों और धर्म का संकेत देते हैं। इन मुहरों के अग्रभाग पर पशु का अंकन एवं संक्षिप्त लेख उत्कीर्ण है तथा पीछे एक घुण्डी बनी हुई है जो सम्भवतया टाँगने के काम आती थी।

प्रश्न 13. कौटिल्य ने किन विषयों को इतिह्मस में सम्मिलित किया है?
उत्तर: कौटिल्य ने इतिहास में पुराण, इतिवृत्त, आख्यान, उदाहरण, धर्मशास्त्र एवं अर्थशास्त्र को सम्मिलित किया है। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘अर्थशास्त्र’ में तत्कालीन राजप्रबन्ध, अर्थव्यवस्था, सामाजिक व धार्मिक जीवन की विस्तृत जानकारी मिलती है।

प्रश्न 14. मृदपात्र संस्कृतियों के नाम बताइये।
उत्तर: पाषाणकालीन मानवीय संस्कृति व सभ्यता के बारे में जानकारी के लिए उत्खनन से प्राप्त पुरावशेष ही मुख्य स्रोत हैं। प्राप्त औजारों एवं मृदभाण्डों से हम भारत में मानव विकास की यात्रा को समझ सकते हैं। इतिहासकारों के अनुसार प्राचीन में चार मृद्भाण्ड संस्कृतियाँ विद्यमान रही हैं

  1. गेरुए रंग युक्त मृद्भाण्ड संस्कृति
  2. काली व लाल मृद्भाण्ड परम्परा
  3. चित्रित स्लेटी रंग की मृद्भाण्ड संस्कृति
  4. उत्तरी काली चमकीली परम्परा।

प्रश्न 15. प्राचीन भारत में समुद्री यात्राएँ व नौका शास्त्र के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
भारत में प्राचीन काल से ही समुद्री मार्गों, बन्दरगाहों, जलयानों आदि का व्यापारिक दृष्टि से अत्यन्त महत्व रहा है। पाँच-छः हजार वर्ष पूर्व हमारे यहाँ विकसित बन्दरगाह थे; जैसे- लोथल (गुजरात), पेरीप्लस में चोल दभोल, राजापुर, मालवण, गोवा, कोटायम्, कोणार्क, मच्छलीपट्टनम् एवं कावेरीपट्टनम आदि। इन बन्दरगाहों से भारत का व्यापार मिस्र, मेसोपोटामिया, ईरान आदि देशों के साथ होता था। सिन्धु सभ्यता की अनेक मुहरों व पात्रों पर जलपोतों के प्राप्त चित्र भी प्राचीन भारत के अन्य देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्धों का प्रमाण हैं।

अनेक विदेशी यात्री; जैसे- वास्कोडिगामा, फाह्यान, ह्वेनसांग आदि ने आवागमन में भारतीय जलमार्ग का प्रयोग किया। नौका शास्त्र-राजा भोज द्वारा रचित पुस्तक युक्तिकल्पतरु में नौका निर्माण एवं नौकाओं के प्रकार का विस्तृत उल्लेख हैं। दिशा ज्ञान के लिए भारतीय नाविकों द्वारा लौह मत्स्य यंत्र का प्रयोग किया गया। मेगस्थनीज ने भी नौ दलों के नौका संगठन का उल्लेख किया है। नौकाओं का समूह जब सागर में चलता था तो नौकाध्यक्ष उस समूह का प्रमुख अधिकारी होता था। प्रत्येक नौका के प्रमुख को कर्णधार तथा पतवार सँभालने वाले को नियामक कहा जाता था।

प्रश्न 16. वंशावली क्या है?
उत्तर: घंशावली व्यक्ति के इतिहास को शुद्ध रूप से सहेज कर रखने की प्रणाली है। यह व्यक्ति के पूर्वजों के सम्बन्ध में जानकारी देती है। वंशावली लेखक हर जाति, वर्ग के घर – घर जाकर प्रमुख लोगों की उपस्थिति में संक्षेप में सृष्टि रचना से लेकर उसके पूर्वजों की ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक घटनाओं का वर्णन करते हुए उस व्यक्ति का वंश क्रम हस्तलिखित पोथियों में अंकित करता है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी में पुरातात्विक स्रोतों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी के सर्वाधिक विश्वसनीय स्रोत पुरातात्विक स्रोत हैं। पुरातत्व का तात्पर्य अतीत के अवशेषों के माध्यम से मानव क्रिया-कलापों का अध्ययन करना है। पुरातात्विक स्रोतों का विभाजन निम्नानुसार किया जा सकता है

1. उत्खनन से प्राप्त पुरावशेष:
पाषाणकालीन मानवीय संस्कृति व सभ्यता के बारे में जानकारी के लिए उत्खनन से प्राप्त पुरावशेष ही मुख्य स्रोत हैं। प्राप्त औजारों एवं मृदभाण्डों से हम भारत में मानव विकास की यात्रा को समझ सकते हैं। इतिहासकारों के अनुसार प्राचीन भारत में चार मृदभाण्ड संस्कृतियाँ विद्यमान रही हैं।

  1. गेरुए रंग युक्त मृदभाण्ड संस्कृति
  2. काली व लाल मृदभाण्ड परम्परा
  3. चित्रित स्लेटी रंग की मृद्भाण्ड संस्कृति
  4. उत्तरी काली चमकीली परम्परा।

उत्खनन से सड़कें, नालियाँ, भवन, ताँबे व कांस्य के बने औजार, बर्तन व आभूषण आदि पुरावशेष मिले हैं जिससे तत्कालीन मानव समाज व संस्कृति की जानकारी मिलती है।

2. अभिलेख:
तिथियुक्त एवं समसामयिक होने के कारण ऐतिहासिक दृष्टि से अभिलेखों का विशेष महत्व है। इनमें सम्बन्धित शासक व व्यक्तियों के नाम, वंश, तिथि, कार्य व समसामयिक घटनाओं आदि का उल्लेख होता है। अभिलेखों में सबसे प्रमुख अशोक द्वारा लिखवाये गये लेख हैं जो शिलालेखों, स्तम्भ लेखों तथा गुहालेखों तीन रूपों में मिलते हैं।

अन्य प्रमुख अभिलेख खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख, गौतमीपुत्र सातकर्णी का नासिक अभिलेख, रुद्रदामन का अभिलेख, जूनागढ़ शिलालेख, चन्द्रगुप्त का महरौली स्तम्भ लेख, स्कन्दगुप्त का भितरी स्तम्भ लेख, समुद्रगुप्त का प्रयाग स्तम्भ लेख, प्रभावती गुप्त को ताम्र लेख आदि हैं।

3. सिक्के व मुद्राएँ:
प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी में सिक्कों, मुद्राओं व मोहरों का भी महत्वपूर्ण योगदान रह्म है। इनसे शासकों के नाम, तिथियाँ, चित्र, वंश परम्परा, धर्म, गौरवपूर्ण कार्यों, कला, शासक की रुचि आदि की जानकारी मिलती है। सिक्कों के साथ ही मुहरें भी प्रचलित थीं। इन पर राजा, सामन्त, पदाधिकारीगण, व्यापारी या व्यक्ति विशेष के हस्ताक्षर तथा नाम होते थे।

4. स्मारक व भवन:
पुरातात्विक स्रोतों के अन्तर्गत भूमि पर एवं भूगर्भ में स्थित सभी अवशेष स्तूप, चैत्य, विहार, मठ, मन्दिर, राजप्रासाद, दुर्ग व भवन सम्मिलित हैं। इससे उस समय की कला, संस्कृति व राजनैतिक जीवन की जानकारी मिलती है।

5. मूर्तियाँ, शैलचित्र कला व अन्य कलाकृतियाँ:
उत्खनन में अनेक स्थानों से विभिन्न मूर्तियाँ, टेराकोटा की कलाकृतियाँ प्राप्त हुई हैं जो उस समय के धार्मिक सामाजिक व सांस्कृतिक जीवन की जानकारी देती हैं। इसके अलावा प्रागैतिहासिक काल में अनेक शैलचित्र प्राप्त हुए हैं जिनसे प्रारम्भिक मानव के सांस्कृतिक, सामाजिक व धार्मिक जीवन की जानकारी मिलती है।

प्रश्न 2. प्राचीन भारतीय वैभव की जानकारी में वैदिक साहित्य की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर: विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ वेद हैं। वेदों की गिनती विश्व के सर्वश्रेष्ठ साहित्य में की जाती है और यही वेद वैदिक सभ्यता के आधार स्तम्भ हैं। वेदों के द्वारा हमें सम्पूर्ण आर्य सभ्यता व संस्कृति की जानकारी मिलती है। इस सभ्यता के निर्माता आर्य थे। आर्य शब्द का शाब्दिक अर्थ है-श्रेष्ठ या उत्तम। वेदों से हमें इन्हीं श्रेष्ठ व्यक्तियों की जानकारी मिलती है। वैदिक साहित्य में आर्य शब्द का अनेक स्थानों पर प्रयोग हुआ है। वैदिक साहित्य के अनुसार आर्यों की उत्पत्ति भारत में हुई तथा वे भारत से ईरान और यूरोप की ओर गए।

वेदों की रचना संस्कृत भाषा में हुई जो भारतीय संस्कृति का वैभव है। प्राचीन काल में जितना साहित्य संस्कृत में लिखा गया उतना अन्य भाषा में नहीं मिलता है। ऐसा कोई ज्ञान नहीं था जिसका उल्लेख वैदिक साहित्य में न किया गया हो। वेदों को अपौरुषेय कहा गया है। हमारे ऋषियों ने लम्बे समय तक जिस ज्ञान का साक्षात्कार किया उसका वेदों में संकलन किया गया है। इसलिए वेदों को संहिता कहा गया है। वेदों की संख्या चार हैं-ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद आर्यों का सबसे प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद है। इसमें 10 अध्याय और 1028 सूक्त हैं।

इसमें छन्दों में रचित देवताओं की स्तुतियाँ हैं। प्रत्येक सूक्त में देवता व ऋषि का उल्लेख है। सामवेद में काव्यात्मक ऋचाओं का संकलन है। इसके 1801 मंत्रों में से केवल 75 मंत्र नये हैं शेष ऋग्वेद के हैं। ये मंत्र यज्ञ के समय देवताओं की स्तुति में गाये जाते हैं। यज्ञों, कर्मकाण्डों व अनुष्ठान पद्धतियों का संग्रह यजुर्वेद में है। इसमें 40 अध्याय हैं एवं शुक्ल व कृष्ण यजुर्वेद दो भाग हैं। अन्तिम वेद अथर्ववेद में 20 मण्डल 731 सूक्त और 6000 मंत्र हैं। इसकी रचना अथर्व ऋषि द्वारा की गयी। इसका अन्तिम अध्याय ईशोपनिषद है, जिसका विषय आध्यात्मिक चिन्तन हैं।

प्रत्येक वेद के चार भाग हैं-संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद्। वेदों की व्याख्या संहिताओं में की गई है। यज्ञ और कर्मकाण्डों पर आधारित जो साहित्य रचा गया वे ब्राह्मण ग्रन्थ कहलाते हैं। आरण्यक ग्रंथों की रचना ऋषियों द्वारा वनों में की गई। इनमें दार्शनिक विषयों का विवरण मिलता है, जबकि उपनिषदों में गूढ़ विषयों एवं नैतिक आचरण नियमों की जानकारी मिलती है।

वैदिक साहित्य को ठीक प्रकार से समझने के लिए वेदांग साहित्य की रचना की गई जिसके छः भाग हैं-शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त छन्द एवं ज्योतिष। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्ववेद व शिल्पवेद चार उपवेद भी हैं जिनसे चिकित्सा, वास्तुकला, संगीत, सैन्य विज्ञान आदि की जानकारी मिलती है। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि वेद ज्ञान के समृद्ध भण्डार हैं तथा प्राचीन भारतीय समाज के स्वरूप को परिलक्षित करते हैं।

प्रश्न 3. प्राचीन भारत में विज्ञान व कला के क्षेत्र में समृद्धता पर निबन्ध लिखिए।
उत्तर: प्राचीन भारतीय संस्कृति कला व विज्ञान के क्षेत्र में प्रारम्भ से उत्कृष्ट रही है। कला व विज्ञान के क्षेत्र की उपलब्धियों ने भारत ही नहीं वरन् सम्पूर्ण विश्व को लाभान्वित किया है। कला व विज्ञान के क्षेत्र में उपलब्धियों का अध्ययन हम निम्न प्रकार कर सकते हैं।

1. कला के क्षेत्र में समृद्धता:
भारतीय कलाकारों की अपने विचारों और भावनाओं की सुन्दर एवं कलात्मक अभिव्यक्ति भारतीय संस्कृति-परम्परा की बेजोड़ कड़ी है। कला के उत्कृष्ट प्रमाण सिन्धु सरस्वती सभ्यता में भी मिलते हैं। उत्खनन से प्राप्त मुहरों एवं बर्तनों पर आकर्षक चित्रकारी देखने को मिलती है। मिट्टी से बने मृभाण्ड, मृणमूर्तियाँ, मुहर निर्माण, आभूषण निर्माण आदि इस सभ्यता के उत्कृष्ट कला प्रेम के उदाहरण हैं।

वैदिक काल में अयस् धातु को आग में पिघलाकर उसे पीट कर विभिन्न आकार देने में यहाँ के लोग सक्षम थे। ऋग्वेद में हिरण्य (सोना) से विभिन्न आभूषण बनाये जाने का उल्लेख है। आभूषणों में कर्णशोभन व निस्क (स्वर्णमुद्रा या मूल्य की इकाई का आभूषण) बनाये जाते थे। वैदिक आर्य कपड़ा बनाने की कला से भी परिचित थे। इस काल में काष्ठ कला के भी उत्कृष्ट उदाहरण मिलते हैं।

जैन धर्म और बौद्ध धर्म का भी कला के क्षेत्र में विशेष योगदान रहा। इन धर्मों के अनुयायियों द्वारा भारत के विभिन्न भागों में निर्मित मन्दिर, मठ, चैत्य, विहार, स्तूप, मूर्तियाँ गुफाएँ भारतीय कला के उत्कृष्ट प्रमाण हैं। कौलवी की बौद्ध गुफाएँ, साँची, भरहुत एवं अमरावती के स्तूप, कन्हेरी (मुम्बई), कालें भाजा (मुम्बई-पुणे के मध्य) के चैत्य विहार बौद्धकला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। मूर्तिकला की दृष्टि से गांधार व मथुरा कला विशेष उल्लेखनीय है। सारनाथ से प्राप्त प्रसिद्ध बौद्ध प्रतिमा भारतीय कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। अजन्ता के भित्ति चित्र चित्रकला की दृष्टि से विश्व विख्यात हैं।

2. विज्ञान के क्षेत्र में उपलब्धियाँ:
विज्ञान के विभिन्न विषयों; जैसे-चिकित्सा विज्ञान, खगोल एवं ज्योतिष विज्ञान, गणित तथा रसायन विज्ञान आदि पर लिखे गये ग्रंथों से परवर्ती लोगों को अत्यन्त सहायता मिली तथा इन ग्रंथों का अरबी, लैटिन व अंग्रेजी भाषा में अनुवाद हुआ। चिकित्सा विज्ञान में आयुर्वेद, जिसे ऋग्वेद का एक उपवेद कहा जाता है की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। आयुर्वेद के त्रिधातु सिद्धान्त, त्रिदोष सिद्धान्त, पंच भौतिक देह व उसका पुरुष प्रकृति सम्बन्ध, सांख्य दर्शन का सप्तधातु सिद्धान्त आज भी उपयोगी है। चरक, सुश्रुत, धनवन्तरि, बाग्भट्ट इस क्षेत्र के प्रमुख विद्वान थे।

आर्यभट्ट की वर्गमूल निकालने की पद्धति, त्रिभुज, चतुर्भुज, वृत्त की परिधि का क्षेत्रफल, पाई का चार दशमलव तक मान, ब्रह्मगुप्त के घात के विस्तार का सूत्र, बोधायन के शुल्वसूत्र में क्षेत्रफल के सूत्र तथा चिति प्रमेय सिद्धान्त, वर्ग सूत्र एवं आपस्तम्ब कात्यायन द्वारा वृत्त के ग्राफ को नापने की विधि आदि गणित के क्षेत्र में भारतीयों की विश्व को अमूल्य देन है।

भारतीय पंचाग प्रणाली, प्राचीन ज्योतिषविदों द्वारा प्रतिपादित चन्द्र द्वारा पृथ्वी को परिभ्रमण, पृथ्वी का अपने अक्ष पर भ्रमण देखकर बारह राशियाँ, सत्ताईस नक्षत्र, तीस दिन का चन्द्र मास, बारह मास का वर्ष, चन्द्र व सौरवर्ष में समन्वय हेतु तीसरे वर्ष पुरुषोत्तम मास के द्वारा समायोजन आदि सिद्धान्त आज भी यथावत् हैं।

भौतिकी क्षेत्र में कणाद ऋषि ने अणु सिद्धान्त, पदार्थ व उसके संघटक तत्व व गुण का सिद्धान्त तथा अणुओं के संयोजन की विशद धारणा प्रस्तुत की। पदार्थ, कार्यशक्ति, गति व वेग आदि विषयक भौतिक सिद्धान्त प्राचीन ऋषियों व विद्वानों ने दिये। प्राचीन काल में भारतीयों को रासायनिक मिश्रण का भी ज्ञान था। इसका उदाहरण मेहरौली का लौह स्तम्भ है जो आज भी उसी अवस्था में हैं।

प्रश्न 4.  प्राचीन भारत में राजनैतिक तंत्र व गणतन्त्रात्मक शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करिए।
उत्तर: प्राचीन भारत की राजनीतिक व्यवस्था को प्रत्येक काल में भिन्न-भिन्न रूपों में देखा गया जो निम्नलिखित हैं

1. सिन्धु सभ्यता का राजनीतिक जीवन:
सिन्धु सभ्यता की लिपि अपठनीय होने के कारण इस काल के राजनीतिक जीवन का निर्धारण करना दुष्कर है। खुदाई में प्राप्त विभिन्न भग्नावशेषों के आधार पर ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यहाँ के निवासियों का जीवन सुखी और शांतिपूर्ण था। नागरिकों को सार्वजनिक रूप से अधिकाधिक सुख सुविधाएँ उपलब्ध थीं।

2. वैदिक काल की राजनैतिक व्यवस्था:
वैदिक काल में व्यवस्थित राजनैतिक जीवन की शुरुआत हो चुकी थी। वैदिक युग में राजतन्त्रीय शासन प्रणाली प्रचलित थी। राजा राज्य का सर्वोच्च अधिकारी होता था राजा को शासन कार्य में सहायता देने के लिए जनता द्वारा निर्वाचित सभा और समिति नामक दो परिषदें होती थीं। वैदिक काल में राष्ट्र-जन-विश-ग्राम-कुल राजनैतिक संगठन का अवरोही क्रम था।

3. महाकाव्य काल:
इस काल में भी राजतन्त्रीय शासन प्रणाली प्रचलित थी। राजा का पद वंशानुगत था तथा उसकी सहायता के लिए मंत्रिपरिषद् भी होती थी। इस समय कुछ गणराज्यों का भी उल्लेख मिलता है जिसमें-अन्धक, वृष्णि, कुकुर और भोज प्रमुख थे।

4. महाजनपद काल:
इस काल में राजतंत्रात्मक एवं गणतंत्रात्मक दोनों शासन व्यवस्थाओं का विकास हुआ। ऋग्वैदिक काल में जन (कबीले) का स्थायी भौगोलिक आधार नहीं था। उत्तर वैदिक़ काल में जन बसना शुरू हो गये। अतः ये जनपद कहे जाने लगे। जनपदों में भू-विस्तार के लिए आपसी संघर्ष होने लगा। निर्बल राज्य शक्तिशाली राज्यों में विलीन हो गये और जनपदों ने महाजनपदों का रूप ले लिया। बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय में 16 महाजनपदों की सूची दी गई है। इन महाजनपदों में दस राज्यों में गणतंत्रात्मक शासन प्रणाली थी शेष में राजतंत्रात्मक शासन व्यवस्था थी।

बौद्ध कालीन गणराज्यों के विधान और शासन पद्धति में गणराज्य का राजा या प्रमुख निर्वाचित व्यक्ति होता था। उपराजा भण्डारिक एवं सेनापति राजा की सहायता करते थे। गणतन्त्रों की न्यायिक व्यवस्था भी विशेष प्रकार की होती थी। इसमें अपराधी की जाँच-पड़ताल सात न्यायिक अधिकरियों द्वारा की जाती थी तथा उसके बाद ही उसे दण्ड दिया जाता था।

हमारी वर्तमान संसदीय एवं संवैधानिक व्यवस्था में महाजनपदकालीन गणतंत्रीय व्यवस्था के लक्षण स्पष्ट दिखाई देते हैं, लेकिन यह व्यवस्था लम्बे समय तक अस्तित्व में नहीं रह सकी। कालान्तर में मौर्य शासक चन्द्रगुप्त ने केन्द्रीयकृत शासन व्यवस्था की स्थापना कर सम्पूर्ण भारतवर्ष को एक राजनैतिक इकाई के रूप में संगठित किया।

प्रश्न 5. प्राचीन काल में भारत के सांस्कृतिक साम्राज्य के विश्व में प्रसार का वर्णन कीजिए।
उत्तर: भारत का इतिहास एवं संस्कृति अपने प्रारम्भिक काल से गौरवमयी रही है। उत्खनन एवं पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर भी हमें भारतीय संस्कृति का विश्व स्वरूप दिखायी देता है। इसके कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं

  1. चीन की दीवार के उत्तरी दरवाजे पर संस्कृत भाषा में आज भी उल्लेख है ‘यक्षों’ के द्वारा परमेश्वर हमारी रक्षा करें।
  2. पश्चिमी इतिहासकारों म्यूर, सरवाल्टर रैले, कर्नल अल्काट, फ्रांसीसी दार्शनिक वाल्टेयर, मैक्समूलर आदि ने भी भारतीय संस्कृति एवं इतिहास की श्रेष्ठता के सम्बन्ध में अपने उद्गार प्रकट किये हैं।
  3. चम्पा, अनाम पाण्डरेग, इन्द्रपुर बाली, कलिंग जैसे; नगरों के नाम या राम, बर्मा जैसे व्यक्तियों के नाम भारतीय परम्परा से अटूट सम्बन्ध दर्शाते हैं।
  4. कम्बोडिया के अंगकोरवाट के स्मारक, जावा के बोरोबुदूर के मन्दिर अन्य देशों में भारतीय संस्कृति के प्रसार का प्रमाण देते हैं।

प्राचीन काल में भारत भूमि और समुद्र दोनों पर फैला हुआ था। उस समय के सांस्कृतिक भारत की सीमाएँ अफगानिस्तान से लेकर सम्पूर्ण दक्षिणी पूर्वी एशिया में फैली हुई थी। शक्तिशाली जलयानों में बैठकर भारतीय ब्रह्म देश, श्याम, इण्डोनेशिया, मलेशिया, आस्ट्रेलिया, बोर्निओ, फिलीपीन्स, जापान एवं कोरिया तक पहुँचे और वहीं अपना राजनैतिक तथा सांस्कृतिक साम्राज्य स्थापित किया। प्रशान्त महासागर के द्वीपों से ऐसे ही अन्य नाविक मध्य अमेरिका के मैक्सिको, हांडुरास, दक्षिण अमेरिका के पेरु, बोलीविया तथा चिली के विभिन्न स्थानों पर पहुँचे और वहाँ उन्होंने अपने निवास बनाये।

पश्चिमी भारत के बन्दरगाहों से द्रविड़ पर्यटक तथा नाविक सोमालीलैण्ड से लेकर दक्षिण अफ्रीका तक के समस्त पूर्वी समुद्र तट पर जगह – जगह अपने वास स्थल बनाने में सफल हुए। इसी प्रकार भारतीय शूरवीरों की एक शाखा ने तिब्बत, मंगोलिया, सिंक्यान, उत्तरी चीन, मंचूरिया, साइबेरिया और चीन पहुँचकर भारतीय संस्कृति का प्रभाव जमाया। पश्चिम की ओर गंधार, पर्शिया, ईरान, इराक, तुर्किस्तान, अरब, टर्की तथा दक्षिणी रूस के विभिन्न राज्यों एवं फिलीस्तीन पहुँचकर भी भारतीयों ने अपनी संस्कृति का ध्वज फहराया।

इस प्रकार सुसंस्कृत जन आर्य भारत से विश्व के विभिन्न देशों में जल तथा थल मार्ग से पहुँचे तथा वहाँ उन्होंने अपने धर्म, संस्कृति और सभ्यता का प्रचार कर वहाँ के निवासियों को भारतीय संस्कृति से अवगत कराया जिसके परिणामस्वरूप निम्न साम्राज्यों व संस्कृतियों का उदय हुआ

  1. कौण्डिन्य नाम के वीर ने फूनान संस्कृति का निर्माण किया।
  2. कम्बु ने कम्बोडिया पहुँचकर साम्राज्य स्थापित किया।
  3. चम्पा और अनाम के बलाढ्य हिन्दू राज्य उदित हुए।
  4. सुमात्रा में श्रीविजय के वैभवपूर्ण साम्राज्य का उदय हुआ।
  5. अश्ववर्मन नामक साहसी वीर बोनिओ पहुँचा तथा उसने अपनी संस्कृति का विस्तार किया।

इन साहसी वीरों ने भारतीय दर्शन, विज्ञान, ज्योतिष, गणित, स्थापत्य, युद्ध शास्त्र, नीति शास्त्र, संगीत वैदिक ग्रंथों आदि का विश्व में प्रसार किया। इण्डोनेशिया, कम्बोडिया, इण्डोचाइना, बोर्निओ से संस्कृत भाषा के सैकड़ों लेख मिले हैं। यहाँ के शिव, विष्णु व बौद्ध मन्दिर भारतीय संस्कृति के प्रतीक हैं। इन देशों को रहन – सहन परम्परा, पूजा पद्धति, शास्त्र विधि, नीति कल्पना, आचारे व्यवहार आदि में भारतीय परम्परा की झलक मिलती है।

प्रश्न 6. प्राचीनकाल में भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था। इस कथन के सम्बन्ध में प्राचीन भारत के आर्थिक वैभव को रेखांकित करिए।
उत्तर: भारत की आर्थिक समृद्धता हमारे वैभवशाली अतीत को दर्शाती है। आर्थिक समृद्धता के कारण प्राचीनकाल में भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था। प्राचीन भारत कृषि, खनिज, प्राकृतिक सम्पदा से परिपूर्ण था जो इसकी आर्थिक समृद्धि का आधार थे। लोग विभिन्न आर्थिक गतिविधियों में संलग्न थे।

1. कृषि:
भारत सदैव एक कृषि प्रधान देश रहा है। कृषि एवं पशुपालन भारत की अर्थव्यवस्था का मूल आधार हैं। ऋग्वेद में जुताई, बुवाई, फसल की कटाई, बैल द्वारा हल खींचना, खाद्यान्नों के उत्पादन का उल्लेख है। इनसे तत्कालीन समय की उन्नत कृषि के संकेत मिलते हैं। कुल्याओं (नहरों) का भी उल्लेख मिलता है जो उत्तम सिंचाई व्यवस्था को इंगित करते हैं।

2. पशुपालन:
वैदिक काल में लोग कृषि के साथ पशुपालन भी किया करते थे। गाय, बैल, भेड़, बकरी आदि इनके प्रमुख पाल्य पशु थे। महाकाव्य काल तक आते आते पशुपालन तकनीकी में विकास के संकेत मिलते हैं।

3. उद्योग:
प्राचीन काल में आभूषण निर्माण, कपड़ा, बर्तन तथा चमड़ा उद्योग विकसित अवस्था में थे। इस समय मुद्रा का भी प्रचलन हो गया था। वैदिक काल में हस्तशिल्प उद्योगों का सर्वाधिक महत्व था। भौतिक समृद्धि और मानव जीवन की आवश्यकताओं के अनुसार नये – नये हस्तशिल्प उद्योगों का विकास हुआ था। स्त्रियाँ भी इन व्यवसायों में रुचि लेती थीं जैसे- कपड़ा बुनना, रंगना, बर्तन निर्माण आदि। इस समय के नये प्रमुख उद्योग मछली पकड़ना, रस्सी बटना, स्वर्णकारी, वैद्यगिरी और रंगसाजी आदि थे। इस काल में लोगों को धातुओं का व्यापक रूप से ज्ञान था जिनका प्रयोग वे औजार, हथियार तथा आभूषण बनाने में करते थे।

4. व्यापार:
प्राचीन भारत में व्यापार भी काफी उन्नत था। एक प्रसंग में इन्द्र की प्रतिमा का मूल्य 10 गायें बताया गया है। ऋग्वेद में 100 पतवार वाली नाव का उल्लेख है। तेतरीय उपनिषद् में अधिक अन्न उपजाने का संदेश दिया गया है। उत्तर वैदिक काल में कृषि की नई तकनीकी का विकास हुआ। इस काल में अनेक व्यावसायिक संघों का चलन भी अस्तित्व में आ गया। श्रेष्ठी, गज, गणपति शब्द का प्रयोग इसी सन्दर्भ में हुआ है।

5. कर:
महाकाव्य काल में यह प्रमाण मिलता है कि उपज का 1/6 से 1/10 भाग कर के रूप में देना होता था। इस प्रकार प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था अत्यन्त सुदृढ़ एवं समृद्धशाली थी जिसके संसाधनों ने चिरकाल तक सम्पूर्ण विश्व को अपनी ओर आकर्षित किया।

प्रश्न 7. भारत के प्राचीन धार्मिक वैभव पर एक निबन्ध लिखिए।
उत्तर: धार्मिक विशेषताओं एवं समृद्धि के कारण ही भारत को विश्वगुरु का दर्जा प्राप्त था। वैदिक कालीन सभी देवी देवता तीन वर्गों में विभाजित थे

  1. स्वर्गवासी देवता (आकाशवासी) – द्यौस, वरुण, सूर्य, सावित्री, अदिति, ऊषा, मित्र, विष्णु, अश्विन।
  2. पार्थिव देवता (पृथ्वीवासी) – पृथ्वी, अग्नि, सोम, वृहस्पति सरस्वती आदि।
  3. वायुमण्डलीय देवता (अन्तक्षवासी) – वरुण, वात, इन्द्र, रुद्र, पर्जन्य, मारुत।

इन देवताओं की उपासना प्रार्थना, स्तुति तथा यज्ञ के माध्यम से की जाती थी।

प्रकृति पूजा:
ऋग्वेद में अनेक ऐसी ऋचाएँ हैं जिनसे पता चलता है कि इन प्राकृतिक शक्तियों की देव रूप में उपासना अन्त में सम्पूर्ण प्रकृति के देवता की उपासना में परिवर्तित हो गयी। प्रकृति की बहुदैवीय शक्तियों की उपासना होते हुए भी ईश्वर की परम एकता पर बल दिया जाता था।

यज्ञ:
प्रार्थना तथा स्तुति के द्वारा देवताओं की पूजा करने के अतिरिक्त आर्य लोग यज्ञ भी करते थे। यज्ञ की अग्नि को प्रज्वलित करके वे मंत्रोच्चारण के साथ हवन करते थे। आर्यों का धर्म मानव कल्याण के लिए था। ये लोग प्रकृति के रूप में अनेक देवी देवताओं की पूजा करते हुए बहुदेववादी होते हुए भी सभी देवताओं को परम परमात्मा का अंश मानते थे। इस दृष्टि से वे एकेश्वरवादी थे। उपनिषदों के दर्शन के अनुसार ब्रह्म से सम्पूर्ण जगत की उत्पति हुई है और यह जगत पुनः ब्रह्म में विलीन हो जाता है। आत्म का ब्रह्म में विलय होना ही मोक्ष कहलाता है।

उपनिषद् हमें सांसारिक वस्तुओं के प्रति मोह – त्याग, मन व बुद्धि को निर्मल बनाने और सादगी व सदाचारी जीवन जीने का संदेश देते हैं। हमारे अनेक महापुरुषों रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामतीर्थ, महर्षि अरविन्द, स्वामी दयानन्द सरस्वती ने उपनिषद् दर्शन की विवेचना की है। श्रीमद्भागवत जैसे; धर्म, दर्शन व नीति के उत्कृष्ट ग्रंथ ने नैतिकतापूर्ण आचरण पर विशेष बल दिया तथा फल की कामना के बिना कर्म के मार्ग पर चलने का संदेश दिया। नि:संदेह भारतीय धार्मिक दर्शन का मानव कल्याण व राष्ट्र कल्याण में अमूल्य योगदान है।

प्रश्न 8. भारतीय इतिहास के स्रोत के रूप में वंशावलियों का महत्व बताइये।
उत्तर: वंशावली लेखन परम्परा व्यक्ति के इतिहास को शुद्ध रूप से सहेज कर रखने की प्रणाली है। यह एक ऐसी परम्परा है जिसमें वंशावली लेखक हर जाति, वर्ग के घर-घर जाकर प्रमुख लोगों की उपस्थिति में संक्षेप में सृष्टि रचना से लेकर उसके पूर्वजों की ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक घटनाओं का वर्णन करते हुए उस व्यक्ति का वंश क्रम हस्तलिखित पोथियों में अंकित करता है। वंशावली लेखकों में मुख्य रूप से बड़वा, जागा, रावजी एवं भाट, तीर्थ पुरोहित पण्डे, बारोट आदि प्रमुख हैं। ऐतिहासिक स्रोत की दृष्टि से वंशावलियाँ निम्नलिखित रूप से विशेष महत्वपूर्ण हैं

  1. पुरोहितों द्वारा निर्मित वंशावलियाँ प्रामाणिक दस्तावेज एवं न्यायिक साक्ष्य के रूप में मान्य हैं। भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 के अनुसार वंशावलियों इत्यादि को सुसंगत न्यायिक तथ्य के रूप में स्वीकार किया गया है।
  2. पुरातन एवं मध्यकालीन भारतीय इतिहास लेखन में वंशावलियाँ सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्रोत रही हैं। कई ऐतिहासिक घटनाओं के प्रमाण वंशावलियों से मिलते हैं।
  3. समाज जिन महापुरुषों को अपना आदर्श मानता है, उनकी जानकारी भी हमें वंशावलियों से प्राप्त होती है।
  4. समाज के आर्थिक जीवन के विकास, लोगों के व्यवसाय आदि का उल्लेख भी वंशावली लेखकों द्वारा किया गया है।
  5. प्रत्येक व्यक्ति को अपनी परम्परा, संस्कृति, मूल निवास, विस्तार, वंश, कुलधर्म, कुलाचार, गोत्र वे पूर्वजों के नाम प्राप्त करने का सर्वाधिक विश्वसनीय स्रोत वंशावलियाँ ही हैं।
  6. वंशावलियों द्वारा धर्मान्तरित हिन्दुओं को अपनी जड़ों का परिचय देकर आपसी विद्वेष को कम किया जा सकता है।

इससे धार्मिक उन्माद और अलगाववाद को कम करके देश में साम्प्रदायिक सहयोग की भावना को बढ़ावा दिया जा सकता है। उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि वंशावलियों के माध्यम से हमें इतिहास के महत्वपूर्ण तथ्यों की जानकारी मिलती है। वंशावली लेखन परम्परा की शुरूआत वैदिक ऋषियों द्वारा समाज को सुसंगठित एवं सुव्यवस्थित करने की दृष्टि से की गई थी जो हजार वर्षों से आज भी अनवरत जारी है।

 

 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

 वस्तुनिष्ठ प्रश्न[/su_heading]

प्रश्न 1. वेदों की संख्या कितनी है?
(क) तीन
(ख) चार
(ग) दो
(घ) पाँच।
उत्तर: (ख) चार

प्रश्न 2. यज्ञ और कर्मकाण्डों पर आधारित साहित्य …………. कहलाते हैं।
(क) ब्राह्मण ग्रन्थ
(ख) आरण्यक
(ग) उपनिषद्
(घ) पुराण।
उत्तर: (क) ब्राह्मण ग्रन्थ

प्रश्न 3. पुराणो की संख्या कितनी है?
(क) सत्रह
(ख) उन्नीस
(ग) नौ
(घ) अट्ठारह।
उत्तर: (घ) अट्ठारह।

प्रश्न 4. सिंहलद्वीप के इतिहास को वर्णन किस बौद्ध ग्रंथ में मिलता है-
(क) दीपवंश
(ख) महावंश
(ग) दीपवंश व महावंश दोनों में
(घ) सुत्तपिटक।
उत्तर: (ग) दीपवंश व महावंश दोनों में

प्रश्न 5. जैन साहित्य किस भाषा में लिखा गया है?
(क) पाली भाषा
(ख) प्राकृत भाषा
(ग) हिन्दी भाषा
(घ) संस्कृत भाषा।
उत्तर: (ख) प्राकृत भाषा

प्रश्न 6. कौटिल्य द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रंथ कौन-सा है?
(क) हर्षचरित
(ख) राजतरंगिणी
(ग) अर्थशास्त्र
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:  (ग) अर्थशास्त्र

प्रश्न 7. यात्रियों का राजकुमार किसे कहा जाता है?
(क) बाणभट्ट
(ख) ह्वेनसांग
(ग)फाह्यान
(घ) इत्सिंग।
उत्तर:  (ख) ह्वेनसांग

प्रश्न 8. किस पुराण में भारतवर्ष को जम्बूद्वीप कहा गया है?
(क) अग्निपुराण
(ख) भागवत पुराण
(ग) मत्स्य पुराण
(घ) गरुड़ पुराण।
उत्तर: (क) अग्निपुराण

प्रश्न 9. सबसे प्राचीन वेद कौन – सा है?
(क) ऋग्वेद
(ख) अथर्ववेद
(ग) सामवेद
(घ) यजुर्वेद।
उत्तर: (क) ऋग्वेद

प्रश्न 10. मोहनजोदड़ो की सबसे विस्तृत इमारत कौन-सी है?
(क) स्नानागार
(ख) राजप्रसाद
(ग) अन्नागार
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:  (ख) राजप्रसाद

प्रश्न 11. हड़प्पा सभ्यता के उत्खनन में किस विद्वान का सहयोग प्राप्त था?
(क) राखालदास बनर्जी
(ख) मैकडॉनल्ड
(ग) दयाराम साहनी
(घ) एन. जी. सजूमदार।
उत्तर: (ग) दयाराम साहनी

प्रश्न 12. हड़प्पा सभ्यता का प्रथम खोजा गया स्थल कौन-सा है?
(क) हड़प्पा
(ख) मोहनजोदड़ो
(ग) धौलावीरा
(द) लोथल।
उत्तर:  (क) हड़प्पा

प्रश्न 13. सिंधु सरस्वती सभ्यता में खोजे गए स्थलों में कितने स्थल भारत में है?
(क) 388
(ख) 917
(ग) 517
(घ) 920.
उत्तर:  (ख) 917

प्रश्न 14. हड़प्पा सभ्यता में पक्की ईंटों से बना डॉकयार्ड या गोदीवाड़ा किस स्थल से प्राप्त हुआ है?
(क) कालीबंगा
(ख) धौलावीरा
(ग) लोथल
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर: (ग) लोथल

प्रश्न 15. रथ की आकृति सिंधु सभ्यता के किस स्थल से प्राप्त हुई है?
(क) लोथल
(ख) दैमाबाद
(ग) धौलावीरा
(घ) मोहनजोदड़ो।
उत्तर: (ख) दैमाबाद

प्रश्न 16.  मेसोपोटामिया के अभिलेखों में सिंधु वासियों के लिए किस शब्द का प्रयोग किया जाता है?
(क) आर्य
(ख) द्रविड
(ग) मेलूहा
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:  (क) आर्य

प्रश्न 17. सिन्धु सभ्यता में समाज की सबसे छोटी इकाई क्या थी?
(क) कुल
(ख) वेश
(ग) परिवार
(घ) ग्राम।
उत्तर: (ग) परिवार

प्रश्न 18. ‘History of Sanskrit literature’ पुस्तक के लेखक कौन हैं?
(क) मैकडॉनल्ड
(ख) अल्काट
(ग) वी. एस बाकणकर
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर: (क) मैकडॉनल्ड

प्रश्न 19. उपपुराणों की संख्या कितनी है?
(क) 20
(ख) 21
(ग) 29
(घ) 30.
उत्तर: (ग) 29

प्रश्न 20. वैदिक काल में राजा की निरंकुशता पर अंकुश लगाने वाली संस्थाएँ कौन-सी थीं?
(क) सभा
(ख) समिति
(ग) सभा व समिति दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर: (ग) सभा व समिति दोनों

प्रश्न 21. वर्ण व्यवस्था में वर्गों का मुख्य आधार क्या था?
(क) व्यवस्था
(ख) ज़न्म
(ग) जाति
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर: (क) व्यवस्था

प्रश्न 22. धर्म शास्त्रों में कितने प्रकार के विवाहों का उल्लेख मिलता है?
(क) 5
(ख) 8
(ग) 10
(घ) 7.
उत्तर: (ख) 8

उत्तरमाला:
1. (ख), 2. (क), 3. (घ), 4. (ग), 5. (ख), 6. (ग), 7. (ख), 8. (क), 9. (क), 10. (अ), 11. (ग), 12, (क),  13. (ख), 14. (ग), 15. (ख), 16. (क), 17. (ग), 18. (क), 19. (ग), 20. (ग), 21. (क), 22. (ख)।

CLASS 12 HISTIRY LESSON 1 BHARAT KA VAIBHAVPURN ATIT

 

सुमेलित प्रकार के प्रश्न उत्तर 

सुमेलित कीजिए-

(I)

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उत्तरमाला:
1. (ङ), 2. (क), 3. (च), 4. (ख), 5. (झ), 6. (ग), 7. (घ), 8. (अ), 9. (छ) 10. (ज)।

(II)

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उत्तरमाला:
1, (ख), 2. (क), 3. (ग), 4. (ङ), 5. (घ)।

 

तिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

प्रश्न 1. भारत के पश्चिम में स्थित पर्वत श्रेणियों के नाम बताइए।
उत्तर: भारत के पश्चिम में हिन्दूकुश सफेदकोह, तुर्कमान तथा किर्थर पर्वत श्रेणियाँ स्थित हैं।

प्रश्न 2. इतिहासकार का मुख्य उद्देश्य क्या होता है?
उत्तर: इतिहासकार का मुख्य उद्देश्य मानव संस्कृति का अध्ययन करना होता है।

प्रश्न 3. साक्ष्य किसे कहते हैं?
उत्तर: अतीत की जानकारी के लिए इतिहासकार जिन साधनों का उपयोग करता है, उन्हें साक्ष्य कहते हैं।

प्रश्न 4. भारतीय इतिहास के स्रोतों को कितने भागों में विभाजित किया गया है?
उत्तर: भारतीय इतिहास के स्रोतों को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया गया है-

  1. साहित्यिक स्रोत।
  2. पुरातात्विक स्रोत।

प्रश्न 5. प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी के साहित्यिक स्रोतों का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर: प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी के साहित्यक स्रोतों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है।

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  1. धार्मिक साहित्य में ब्राह्मण साहित्य, बौद्ध साहित्य एवं जैन साहित्य आते हैं।
  2. धर्मेतर साहित्य के अन्तर्गत ऐतिहासिक ग्रंथ, विशुद्ध हैं साहित्यिक ग्रंथ, क्षेत्रीय साहित्य व विदेशी विवरण आते हैं।
  3. वंशावलियाँ इतिहास के स्रोत के रूप में प्रयुक्त की जाती हैं।

प्रश्न 6. सबसे प्राचीन वेद का नाम बताइये।
उत्तर: सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद है।

प्रश्न 7. वेदों की संख्या कितनी है नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर: वेदों की संख्या चार हैं-ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद व अथर्ववेद।

प्रश्न 8. आर्यों द्वारा गाये जाने वाले छन्दों का विवरण किस वेद में मिलता है?
उत्तर: आर्यों द्वारा गाये जाने वाले छन्दों का विवरण सामवेद में मिलता है।

प्रश्न 9. वेदांग साहित्य के कितने भाग हैं?
उत्तर: वेदांग साहित्य के छः भाग हैं-शिक्षा, कल्पे, व्याकरण, निरुक्त, छन्दं एवं ज्योतिष।

प्रश्न 10  पुराणों की संख्या कितनी है? सबसे प्राचीन पुराण का नाम बताइये।
उत्तर: पुराणों की संख्या 18 है। सबसे प्राचीन पुराण मत्स्य पुराण है।

प्रश्न 11. सबसे प्राचीन पुराण का नाम बताइये।
उत्तर: मत्स्य पुराण।

प्रश्न 12.पुराणों के पाँच विषय कौन-कौन से हैं?
उत्तर:  पुराणों के पाँच विषय हैं-सर्ग, प्रतिसर्ग, मनवन्तर, वंश व वंशानुचरित।

प्रश्न 13. पुराणों का रचयिता किन्हें माना जाता है।
उत्तर: पुराणों का रचयिता लोमहर्ष व उनके पुत्र अग्रश्रवा को माना जाता है।

प्रश्न 14. बौद्ध साहित्य में सबसे प्राचीन ग्रंथ का नाम बताइए।
उत्तर: बौद्ध साहित्य में सबसे प्राचीन ग्रंथ त्रिपिटिक है-ये तीन हैं-सुत्तपिटक, विनयपिटक व अभिधम्म पिटक।

प्रश्न 15. प्रसिद्ध बौद्ध ग्रन्थों मिलिन्दपन्ह, दीपवंश व महावंश की रचना किस भाषा में की गई?
उत्तर: प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथों मिलिन्दपन्हों, दीपवंश व महावंश की रचना पाली भाषा में की गयी।

प्रश्न 16. गौतम बुद्ध के जीवन – चरित्र पर आधारित ग्रन्थों का नाम बताइये।
उत्तर: महावस्तु ग्रन्थ, बुद्ध चरित्र, मंजुश्री मूलकल्प, सौन्दरानन्द।

प्रश्न 17. ‘हिस्ट्री ऑफ दी वार’ पुस्तक के लेखक कौन हैं?
उत्तर: ‘हिस्ट्री ऑफ दी वार’ पुस्तक के लेखक एरिस्टोब्युलस हैं।

प्रश्न 18. प्राचीन काल में भारत आने वाले प्रमुख चीनी यात्रियों के नाम बताइये।
उत्तर:  प्राचीन काल में भारत आने वाले प्रमुख चीनी यात्री-फाह्ययान, सुंगयुन, हवेनसांग एवं इत्सिग हैं।

प्रश्न 19. प्राचीन भारतीय इतिहास के पुरातात्विक स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तर: प्राचीन भारतीय इतिहास के पुरातात्विक स्रोत-अभिलेख, उत्खनन से प्राप्त अवशेष, सिक्के, मुहरें, स्मारक, मूर्तियाँ व मंदिर तथा शैल चित्रकला हैं।

प्रश्न 20. अशोक के अभिलेख किस लिपि में लिखे गये हैं?
उत्तर: अशोक के अभिलेख खरोष्ठी एवं ब्राह्मी लिपि में लिखे गये हैं।

प्रश्न 21. अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी का प्राचीन नाम बताइए।
उत्तर: अरब सागर का प्राचीन नाम रत्नाकर तथा बंगाल की खाड़ी का प्राचीन नाम महोदधि था।

प्रश्न 22.किस पुस्तक में नौका निर्माण का उल्लेख मिलता है?
उत्तर:  राजा भोज द्वारा रचित युक्ति कल्पतरु पुस्तक में नौका निर्माण एवं नौकाओं के प्रकार का उल्लेख मिलता है।

प्रश्न 23. इतिहास एवं प्राक् इतिहास किसे कहा जाता है?
उत्तर: जब से मानव ने पढ़ना – लिखना सीखा तब से वर्तमान तक के क्रियाकलापों को ‘इतिहास’ तथा इससे पूर्व के मानव के क्रियाकलाप को ‘प्राक् इतिहास’ कहा जाता है।

प्रश्न 24. पाषाण काल किसे कहते हैं?
उत्तर: जिस काल में मनुष्य पाषाण उपकरणों का प्रयोग करता था उस काल को पाषाणकाल कहते हैं।

प्रश्न 25.पाषाण युग को कितने भागों में बाँटा गया है?
उत्तर:  पाषाण युग को तीन भागों में बाँटा गया है-

  1. पुरापाषाण काल।
  2. मध्यपाषाण काल।
  3. नवपाषाण काल।

प्रश्न 26. आदि मानव ने कृषि तथा पशुपालन करना किस काल में सीखा?
उत्तर: आदि मानव ने कृषि तथा पशुपालन करना नव पाषाण काल में सीखा।

प्रश्न 27. शैलचित्र क्या हैं?
उत्तर: शैलश्रयों की दीवारों पर तत्कालीन मानव द्वारा जीवन के विभिन्न पक्षों से सम्बन्धित चित्रांकन किया गया, जिन्हें शैलचित्र कहते हैं।

प्रश्न 28. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की स्थापना कब और किसके निर्देशन में हुई?
उत्तर: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की स्थापना 1861 ई. में कनिंघम के निर्देशन में हुई।

प्रश्न 29. मोहनजोदड़ो की खोज का श्रेय किसे जाता है?
उत्तर: मोहनजोदड़ो की खोज का श्रेय राखलदास बनर्जी को जाता है। इन्होंने 1922 ई. में मोहनजोदड़ो का पता लगाया था।

प्रश्न 30.वैदिक काल में कौन-सी नदी लोगों के जीवन का आधार थी?
उत्तर:  वैदिक काल में सरस्वती नदी लोगों के जीवन का आधार थी।

प्रश्न 31. सिन्धु सरस्वती सभ्यता को यह नाम किस प्रकार प्राप्त हुआ?
उत्तर: इस सभ्यता का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भौगोलिक एवं सांस्कृतिक विस्तार सिन्धु नदी, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान व गुजरात में लुप्त सरस्वती नदी घाटी क्षेत्र में मिलता है। इसलिए इसे सिन्धु सरस्वती सभ्यता कहा गया।

प्रश्न 32. सिन्धु सरस्वती सभ्यता के उन चार स्थलों के नाम लिखिए जो आधुनिक भारत में नहीं हैं?
उत्तर: आधुनिक भारत में हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, चन्हूदड़ो तथा सुत्कागेण्डोर नामक स्थल स्थित नहीं हैं। ये पाकिस्तान में स्थित हैं।

प्रश्न 33. सिन्धु सरस्वती सभ्यता की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता कौन-सी है?
उत्तर: सिन्धु सरस्वती सभ्यता की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी उचित जल निकास व्यवस्था थी।

प्रश्न 34. सिन्धु सरस्वती सभ्यता का सबसे महत्वपूर्ण बन्दरगाह कौन-सा था?
उत्तर: सिन्धु सरस्वती सभ्यता का सबसे महत्वपूर्ण बन्दरगाह लोथल था।

प्रश्न 35.किन्हीं चार भौतिक साक्ष्यों के नाम बताइये जो पुरातत्वविदों को सिन्धु सभ्यता के लोगों के जीवन को ठीक प्रकार से पुनर्निमित करने में सहायक होते हैं।
उत्तर: 

  1. मृदभाण्ड
  2. आभूषण
  3. औजार
  4. घरेलू सामान।

प्रश्न 36. सिन्धु सरस्वती सभ्यता में खोपड़ी के अवशेष कहाँ से प्राप्त हुए हैं?
उत्तर: सिन्धु सरस्वती सभ्यता में खोपड़ी के अवशेष कालीबंगा तथा लोथल से मिले हैं।

प्रश्न 37. नर्तकी की कांस्य मूर्ति कहाँ से प्राप्त हुई है?
उत्तर: नर्तकी की कांस्य मूर्ति मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई है।

प्रश्न 38.सिन्धु सरस्वती सभ्यता में किन फसलों का उत्पादन होता था?
उत्तर: सिन्धु सरस्वती सभ्यता में गेहूँ, जौ, ज्वार, दाल, मटर, रागी, साम्बा, कपास, खजूर, तिल, चावल आदि का उत्पादन होता था।

प्रश्न 39 . मनके बनाने के कारखानों का प्रमाण किस स्थान से प्राप्त हुआ है?
उत्तर: मनके बनाने के कारखाने लोथल व चन्हूदड़ो से प्राप्त हुए है।

प्रश्न 40. सिन्धु सरस्वती सभ्यता के व्यापारिक सम्बन्ध किस अन्य देश के साथ थे?
उत्तर: सिन्धु सरस्वती सभ्यता के व्यापारिक सम्बन्ध मेसोपोटामिया के साथ थे।

प्रश्न 41.‘हिस्ट्री ऑफ संस्कृत लिट्रेचर’ के लेखक कौन हैं?
उत्तर: ‘हिस्ट्री ऑफ संस्कृत लिट्रेचर’ के लेखक मैकडॉनल्ड हैं।

प्रश्न 42. यज्ञीं, कर्मकाण्डों व अनुष्ठान पद्धतियों का संग्रह किस वेद में है?
उत्तर: यज्ञों, कर्मकाण्डों व अनुष्ठान पद्धतियों का संग्रह यजुर्वेद में है।

प्रश्न 43.अन्तिम वेद कौन – सा है? इसकी रचना किसने की?
उत्तर: अन्तिम वेद अथर्ववेद है। इसकी रचना अथर्व ऋषि द्वारा की गयी।

प्रश्न 44. नौकाओं के प्रकार का उल्लेख किस पुस्तक में मिलता है?
उत्तर: राजा भोज द्वारा रचित ‘युक्ति कल्पतरु’ पुस्तक में।

प्रश्न 45.वैदिक काल में राजनैतिक जीवन की सबसे छोटी इकाई क्या थी?
उत्तर: वैदिक काल में राजनैतिक जीवन की सबसे छोटी इकाई कुल थी।

प्रश्न 46 . महाजनपद काल के चार शक्तिशाली जनपद कौन-से थे?
उत्तर: महाजनपद काल के चार शक्तिशाली जनपद-कोसल, मगध, वत्स और अवन्ति थे।

प्रश्न 47. सोलह महाजनपदों में कितने राज्यों में गणतंत्रात्मक शासन प्रणाली थी?
उत्तर: सोलह महाजनपदों में 10 राज्यों में गणतंत्रात्मक शासन,प्रणाली थी।

प्रश्न 48. चार वर्षों का उल्लेख किस वेद में किया गया है?
उत्तर: चार वर्णो (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शुद्र) का उल्लेख ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के दसवें मण्डल में किया गया है।

प्रश्न 49. वर्ण भेद व्यवस्था को आधार क्या था?
उत्तर: वर्ण भेद व्यवस्था का आधार कर्म था।

प्रश्न 50.आश्रम व्यवस्था को मुख्य उद्देश्य क्या था?
उत्तर:  आश्रम व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य भौतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक व नैतिक लक्ष्यों का समान रूप से समन्वयीकरण करना था।

प्रश्न 51. संस्कार किसे कहते हैं?
उत्तर: भारत में व्यक्तिगत जीवन को सुव्यवस्थित कर पूर्णता की ओर ले जाने के लिए जिन धार्मिक व सामाजिक क्रियाओं को अपनाया जाता है, उन्हें संस्कार कहा जाता है।

प्रश्न 52.वेदों के प्रमुख विषय क्या हैं?
उत्तर:  वेदों के तीन प्रमुख विषय हैं- ईश्वर, आत्मा एवं प्रकृति।

प्रश्न 53.पृथ्वी के भ्रमण का सिद्धान्त किसने प्रतिपादित किया?
उत्तर:  पृथ्वी के भ्रमण का सिद्धान्त आर्यभट्ट ने प्रतिपादित किया।

प्रश्न 54. कणाद ऋषि कौन थे?
उत्तर: कणाद ऋषि वैशेषिक दर्शन के रचयिता एवं अणु सिद्धान्त के प्रवर्तक थे।

प्रश्न 55. आयुर्वेद किस वेद का उपवेद है?
उत्तर: आयुर्वेद ऋग्वेद का उपवेद है।

प्रश्न 56.दशमलव प्रणाली एवं शून्य का आविष्कार किस देश में हुआ?
उत्तर:  दशमलव प्रणाली एवं शून्य को आविष्कार भारत में हुआ। 

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

प्रश्न 1. भारतवर्ष के उत्तर में कौन-कौन से पर्वतीय स्थल हैं?
उत्तर: भारत का अधिकांश भाग उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्र में आता है। इसके उत्तर में हिमालय पर्वतीय क्षेत्र है जिसमें बल्ख, बदरखाँ, जम्मू कश्मीर, कांगड़ा, टिहरी, गढ़वाल, कुमायूँ, नेपाल, सिक्किम, भूटान, असम व हिमालय की ऊँची पर्वत श्रेणियाँ हैं।

प्रश्न 2. इतिहास क्या है तथा इसके अन्तर्गत किन विषयों को रखा जाता है?
उत्तर: इतिहास अतीत की घटनाओं का कोलक्रम है। इतिहास के अन्तर्गत मानव के क्रियाकलापों को तथ्यों के आधार पर पूर्ण विश्वास के साथ प्रमाणित किया जाता है। अतीत का प्रत्यक्षीकरण करना सम्भव नहीं है। अतः साक्ष्यों के आधार पर इतिहासकार इतिहास का निरूपण करता है। इतिहास में मानव का सम्पूर्ण अतीत समाहित रहता है, चाहे वह किसी भी क्षेत्र से सम्बन्धित हो, इसके अन्तर्गत विज्ञान, अर्थशास्त्र, समाज, राजनीति, धर्म व दर्शन आदि विषयों को रखा जाता है।

प्रश्न 3. साहित्यिक स्रोतों का अध्ययन करते समय इतिहासकार को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर: साहित्यिक स्रोतों का अध्ययन करते समय इतिहासकारों को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. ग्रन्थ की भाषा क्या है, जैसे-पाली, प्राकृत, तमिल अथवा संस्कृत जो विशिष्ट रूप से पुरोहितों एवं विशेष वर्ग की भाषा थी।
  2. ग्रन्थ किस प्रकार का है-मंत्रों के रूप में अथवा कथा के रूप में।
  3. ग्रन्थ के लेखक की जानकारी प्राप्त करना जिसके दृष्टिकोण एवं विचारों से इस ग्रंथ का लेखन हुआ है।
  4. इन ग्रन्थों के श्रोताओं को भी इतिहासकार को परीक्षण करना चाहिए क्योंकि लेखकों ने अपनी रचना करते समय श्रोताओं की अभिरुचि पर ध्यान दिया होगा।
  5. ग्रंथों के सम्भावित संकलन एवं रचनाकाल की जानकारी प्राप्त करना और उसकी रचना-भूमि की जानकारी करना।

प्रश्न 4. प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत के रूप में बौद्ध साहित्य की विवेचना कीजिए।
उत्तर: प्राचीन भारतीय इतिहास के निर्माण में बौद्ध साहित्य की प्रमुख भूमिका है। बौद्ध साहित्य के अन्तर्गत अनेक ग्रंथों की रचना हुई जिनमें प्रचुर ऐतिहासिक सामग्री निहित है इनमें से कुछ ग्रंथ निम्नलिखित हैं

  1. बौद्ध साहित्य में सबसे प्राचीन ग्रंथ त्रिपिटक है- ये तीन हैं- सुत्तपिटक, विनयपिटक व अभिधम्म पिटक। इनमें बौद्ध धर्म के नियम व आचरण संगृहीत है।
  2. बौद्ध ग्रंथों में दूसरा महत्वपूर्ण योगदान जातक ग्रंथों का है। इनमें गौतम बुद्ध के पूर्व जन्म की कथाओं की तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक व आर्थिक पक्षों की जानकारी मिलती है।
  3. एक अन्य बौद्ध ग्रंथ मिलिन्दपन्ह में यूनानी आक्रमणकारी मिनेण्डर व बौद्ध भिक्षु नागसेन के मध्य वार्ता को विवरण है।
  4. पाली भाषा में रचित अन्य ग्रंथों दीपवंश व महावंश में सिहंलद्वीप के इतिहास का वर्णन है।
  5. महावस्तु ग्रंथ गौतम बुद्ध के जीवन – चरित्र पर आधारित ग्रंथ है, जबकि ललितविस्तार में लेखक ने गौतम बुद्ध को दैवीय शक्ति के रूप में निरूपित किया है और उनके अद्भुत कार्यों से सम्बन्धित जीवन वृत्त अंकित किया है।

इनके अतिरिक्त मंजुश्री मूलकल्प, अश्वघोष का बुद्धचरित्र, सौदरानन्द काव्य तथा दिव्यावदान से भी ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त होती है।

प्रश्न 5. अभिलेख क्या है? इतिहास के अध्ययन में अभिलेख किस प्रकार सहायक होते हैं?
उत्तरं: अभिलेख पत्थर, धातु या मिट्टी के बर्तन जैसी कठोर सतह पर उत्कीर्ण लेख होते हैं। अभिलेखों में उन लोगों का वर्णन होता है जो इसका निर्माण करवाते हैं। अभिलेख एक प्रकार के स्थायी प्रमाण होते हैं। इतिहास के अध्ययन में इनका बहुत योगदान होता है। सम्राट अशोक के अभिलेखों से हमें सम्राट के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का ज्ञान प्राप्त होता है।

प्रयाग प्रशस्ति स्तम्भ अभिलेख से समुद्रगुप्त के काल की घटनाओं का ज्ञान होता है। जूनागढ़ शिलालेख से राजा रुद्रदामन द्वारा सुदर्शन झील के निर्माण की जानकारी प्राप्त होती है। अधिकतर अभिलेखों में ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपि का प्रयोग किया गया है। कई अभिलेखों पर इनके निर्माण की तिथि भी अंकित है। सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में अब तक लगभग एक लाख अभिलेख प्राप्त हो चुके हैं।

प्रश्न 6. इतिहास के अध्ययन हेतु सिक्के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर: प्राचीन भारत के इतिहास के अध्ययन के लिए सिक्के अत्यन्त महत्वपूर्ण स्रोत हैं। देश के विभिन्न भागों से प्राचीन काल के सिक्के बहुत अधिक संख्या में प्राप्त हुए हैं। सबसे पहले प्राप्त होने वाले सिक्के चाँदी व ताँबे के हैं। मौर्यों के पश्चात् हिन्द यूनानी शासकों ने लेख युक्त मुद्रा प्रारम्भ की। कुषाणों ने सोने के सिक्के जारी किये तथा गुप्त काल में स्वर्ण व रजत मुद्रा प्रचलन में थी। सिक्कों पर राजा का नाम, राज चिन्ह, धर्म चिन्ह व तिथि अंकित होती थी। सिक्कों से प्राचीन इतिहास के सम्बन्ध में निम्नलिखित जानकारी प्राप्त होती हैं

  1. सिक्कों से शासकों के सम्बन्ध में क्रमबद्ध जानकारी प्राप्त होती है। तिथिक्रम निर्धारण के लिए सिक्के उपयुक्त प्रमाण हैं।
  2. सिक्कों के ऊपर खुदे हुए धर्म चिन्ह राजाओं के धर्म के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं।
  3. सिक्कों से तत्कालीन समय की मुहर निर्माण कला के बारे में पता चलता है।
  4. सिक्के सम्बन्धित शासक के शासनकाल में व्यापार एवं आर्थिक दशा को इंगित करते हैं।
  5. सिक्कों से शासकों की अभिरुचियों का भी पता चलता है। इनके अतिरिक्त सिक्के साम्राज्य की सीमाओं का ज्ञान भी कराते हैं तथा नवीन तथ्यों के उद्घाटन में भी सहायक होते हैं।

प्रश्न 7. किन पश्चिमी इतिहासकारों ने भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता के सम्बन्ध में अपने उद्गार प्रकट किये हैं?
उत्तर:  भारतीय संस्कृति का अतीत अत्यधिक वैभवशाली रहा है। इस संस्कृति ने सम्पूर्ण विश्व को अपनी ओर आकर्षित किया है। पश्चिमी इतिहासकारों एवं विद्वानों ने भी भारतीय संस्कृति के विश्व स्वरूप तथा इसकी श्रेष्ठता का वर्णन किया है

  1. इतिहासकार म्यूर ने लिखा है कि भारत के प्राकृतिक सौन्दर्य की भव्यता, विविधता और वनस्पतियों के उत्पादन की समूची दुनिया में बराबरी नहीं है।
  2. सरवाल्टर रैले ने लिखा है कि प्रथम मानव प्राणी का निर्माण भारत खण्ड में हुआ।
  3. कर्नल अल्काट ने मानव संस्कृति का उद्गम स्थल भारतवर्ष को ही माना है।
  4. फ्रांसीसी दार्शनिक वाल्टेयर ने ऋग्वेद की प्रति की भेंट प्राप्त कर कहा था कि यह देन इतनी अमूल्य है कि पाश्चात्य राष्ट्र सदैव पूर्व के प्रति ऋणी रहेंगे।
  5. मैक्समूलर ने मानवीय अन्त:करण एवं बुद्धि की परिपूर्णता, गूढ़तम रहस्यों का विश्लेषण तथा अध्ययन योग्य विषय सुलझाने का श्रेय भारतीय संस्कृति को दिया है।

इस प्रकार भारत की वैभवशाली संस्कृति का गुणगान केवल भारतीय ग्रंथों में ही नहीं वरन् पाश्चात्य विवरणों में भी मिलता है।

प्रश्न 8. भारतीयों ने किन स्थानों पर अपना राजनीतिक एवं सांस्कृतिक साम्राज्य स्थापित किया?
उत्तर:
प्राचीन काल में भारत का विस्तार भूमि और समुद्र दोनों पर था। उसकी सीमा सुमात्रा, जावा द्वीप तक फैली थी। इसका विस्तार अफगानिस्तान से लेकर सम्पूर्ण दक्षिणी पूर्वी एशिया में था। शक्तिशाली जलयानों में बैठकर भारतीय ब्रह्म देश, श्याम, इण्डोनेशिया, मलेशिया, आस्ट्रेलिया, बोर्निओ, फिलीपीन्स, जापान व कोरिया तक पहुँचे तथा वहाँ अपना राजनैतिक तथा सांस्कृतिक साम्राज्य स्थापित किया।
पश्चिम भारत के बन्दरगाहों से द्रविड़ पर्यटक तथा नाविक सोमालीलैण्ड से लेकर दक्षिणी अफ्रीका तक के समस्त पूर्वी समुद्र तट पर जगह-जगह अपने वासस्थल स्थापित करने में सफल हुए।

भारतीय शूरवीरों की एक शाखा हिमालय पर्वत के उत्तर में पूर्व की ओर बढ़ी तथा इन्होंने दक्षिणी रूस के विभिन्न राज्यों तिब्बत, मंगोलिया, सिंक्यांन, उत्तरी चीन, मंचूरिया, साइबेरिया आदि स्थानों तक पहुँचकर भारतीय संस्कृति का प्रभाव स्थापित किया। भारतवासियों की एक शाखा ने पश्चिमी द्वार से प्रस्थान किया और गांधार, पर्शिया, ईरान, इराक, तुर्किस्तान, अरब, टर्की तथा दक्षिणी रूस के विभिन्न राज्यों एवं फिलीस्तीन पहुँचकर अपनी संस्कृति का ध्वज फहराया।

प्रश्न 9.  प्राचीन भारत का अन्य देशों के साथ व्यापार किन बन्दरगाहों से होता था?
उत्तर:
प्राचीन भारत के व्यापारिक सम्बन्ध मिस्र, मेसोपोटामिया, ईरान आदि देशों के साथ थे। व्यापार के लिए अधिकांशतः जलमार्गों का प्रयोग किया जाता था। पाँच-छः हजार वर्ष पूर्व हमारे यहाँ विकसित बन्दरगाह थे। उत्खनन में प्राप्त सौराष्ट्र को लोथल बन्दरगाह व्यापार की दृष्टि से सबसे अधिक प्रसिद्ध था।

इस बन्दरगाह पर 756 फीट लम्बे व 126 फीट चौड़े, 60 से 75 टन माल वाहक जहाज प्रयोग किये जाते थे। पश्चिमी तट पर सोपारा व भृगुकच्छ भी प्रसिद्ध बन्दगाह थे। प्रथम शताब्दी में पेरीप्लस में चोल, दंभोल, राजापुर, मालवण, गोवा, कोटायम्, कोणार्क, मच्छलीपट्टनम एवं कावेरीपट्टनम के बन्दरगाहों का उल्लेख है जिनका प्रयोग व्यापार के लिए किया जाता था।

प्रश्न 10. सिन्धु सरस्वती सभ्यता की जानकारी हमें किन साधनों से मिलती है?
उत्तर: सिन्धु सरस्वती सभ्यता की जानकारी हमें भौतिक साक्ष्यों से मिलती है जो निम्नलिखित हैं-

  1. नगरों तथा भवनों के अवशेष
  2. मृद्भाण्ड, आभूषण, औजार पकी हुई ईंटें एवं घरेलू सामान
  3. पत्थर के फलक, मुहरें एवं बाट
  4. जानवरों की अस्थियाँ।

प्रश्न 11. सिन्धु सरस्वती सभ्यता के विस्तार तथा महत्वपूर्ण स्थलों के बारे में संक्षेप में समझाइये।
उत्तर: सिन्धु सरस्वती सभ्यता का सर्वाधिक भौगोलिक एवं सांस्कृतिक विस्तार भारत में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान व गुजरात में लुप्त सरस्वती नदी घाटी क्षेत्र में मिलता है। इस सभ्यता के अब तक खोजे गए स्थानों में लगभग 917 स्थान भारत में, 481 पाकिस्तान व 2 स्थान अफगानिस्तान में हैं। इसका विस्तार पश्चिम से पूर्व तक 1600 किमी. व उत्तर से दक्षिण तक 1400 किमी. था।

इसका विस्तार अफगानिस्तान (शोर्तगोई व मुण्डीगाक), बलूचिस्तान (सुत्कारेण्डोर, सुत्काखोह, बालाकोट), सिन्ध (मोहनजोदड़ो, चन्हूदड़ो, कोटदीजी, जुदीरजोदड़ा), पंजाब (पाकिस्तान-हड़प्पा, गनेरीवाल, रहमान ढेरी, सरायखोला, जलीलपुर), पंजाब (रोपड़, सघोल), हरियाणा (बनावाली, मीताथल, राखीगढ़ी), राजस्थान (कालीबंगा, पीलीबंगा), उत्तर प्रदेश (आलमगीरपुर, हुलास) गुजरात (रंगपुर, धौलावीरा, प्रभास पट्टन, खम्भात की खाड़ी) वे महाराष्ट्र (दैमाबाद) तक था।

प्रश्न 12. वर्तमान में लुप्त सरस्वती नदी का उद्गम स्थल तथा विस्तार के बारे में बताइये।
उत्तर: सरस्वती नदी का उद्भव हिमालय की शिवालिक पर्वत श्रेणियों में माना पर्वत से था। यह आदि बद्री से समतल में उतरती थी। इसके बाद थानेश्वर, कुरुक्षेत्र, सिरसा, झाँसी, अग्राहेहा; अनुमानगढ़, कालीबंगा से होती हुई अनूपगढ़ व सूरतगढ़ तक बहती थी। यह अनेक भागों से होते हुए समुद्र में जाकर मिलती थी।

एक शाखा प्रभास पट्ट्टन में जाकर सिन्धु सागर में मिलती थी। दूसरी शाखा सिन्धु में प्रविष्ट होकर कच्छ के रण में समा जाती थी। इसकी लम्बाई 1600 किमी और चौड़ाई 32 से 12 किमी. तक थी। भूगर्भीय परिवर्तनों के कारण व मूल जल स्रोतों से पानी न मिलने से धीरे-धीरे यह नदी लुप्त हो गई।

प्रश्न 13. मोहनजोदड़ों तथा हड़प्पा के नगर नियोजन की वर्तमान सन्दर्भ में उपयोगिता बताइये।
उत्तर: मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा में हमें जो नगर नियोजन दृष्टिगत होता है उसकी वर्तमान सन्दर्भ में भी उपादेयता है। क्योंकि वर्तमान समय के नगरों में भी उसी प्रकार की संरचना का विकास किया जाता है जो मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा में दिधमान थी। इन दोनों नगरों को दो भागों में विभाजित किया गया है, दुर्ग क्षेत्र, जहाँ शासक तथा उच्च अधिकारी रहते थे और निचला शहर जहाँ निम्न वर्ग के लोग रहते थे।

आधुनिक नगर नियोजन भी कुछ इसी तरह का होता है, एक तरफ उच्च लोगों के निवास होते हैं तथा दूसरी तरफ मध्यम एवं निम्न वर्ग के लोगों के निवास होते हैं। दोनों नगरों में सड़कों की व्यवस्था रखी जाती थी जो आज के नगरों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। दोनों नगरों में सड़कों का निर्माण भी वर्तमान नगरों की भाँति ही किया गया था। प्रत्येक घर में कुआँ होता था तथा जल निकास की व्यवस्था भी उत्तम थीं।

नालियाँ गन्दे पानी को नगर से बाहर पहुँचाती थीं। बड़ी नालियाँ ढकी हुई थीं। सड़कों की नालियों में मेन होल (तरमोखे) भी मिले हैं। सड़कों की नालियों के बीच – बीच में चेम्बर (शोषगर्त) भी थे जिनकी सफाई करके कूड़ा-करकट निकाल दिया जाता था। यह व्यवस्था आधुनिक समय में भी प्रचलन में है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि वर्तमान में भी मोहनजोदड़ो व हड़प्पा के नगर नियोजन की प्रासंगिकता है।

प्रश्न 14. सिन्धु सरस्वती सभ्यता के लोगों के आर्थिक जीवन के बारें में संक्षेप में समझाइए।
उत्तर: सिन्धु सरस्वती सभ्यता के लोगों को आर्थिक जीवन कृषि, पशुपालन एवं अनेक व्यावसायिक गतिविधियों पर आधारित था। इन्हीं गतिविधियों से उनको जीवन-यापन होता था। इस सभ्यता की प्रमुख आर्थिक गतिविधियाँ निम्नलिखित र्थी-

1. कृषि:
मूलतः यह सभ्यता कृषि पर आधारित थी। गेहूँ, जौ, धान, बाजरा, कपास, दाल, चना, तिल आदि की खेती इस सभ्यता के लोगों द्वारा की जाती थी। हल तथा बैलों का प्रयोग जुताई हेतु किया जाता था। सिंचाई की उत्तम व्यवस्था थी।

2. पशुपालन:
पशुपालन कृषि आधारित दूसरा प्रमुख उप व्यवसाय था।

3. व्यापार:
सिन्धु घाटी सभ्यता के निवासी ने केवल अपने देश वरन् विदेशों से भी व्यापार करते थे। सोने, चाँदी, ताँबे और कीमती पत्थरों, मूर्तियों तथा बर्तनों से पता चलता है कि इनका विदेशों से आयात किया जाता था। अफगानिस्तान, ईरान, मेसोपोटामिया आदि देशों के साथ इनके व्यापारिक सम्बन्ध थे। विदेशी व्यापार के लिए लोथल बन्दरगाह का प्रयोग किया जाता था।

4. उद्योग:
सिन्धु सरस्वती सभ्यता से उत्खनन में प्राप्त ताँबे व कांसे से निर्मित कलाकृतियाँ यहाँ धातु उद्योग के विकसित होने का प्रमाण देती हैं। इसके अतिरिक्त, मेनके बनाने का उद्योग, वस्त्र उद्योग आदि भी उन्नत अवस्था में थे।

प्रश्न 15. सिन्धु सरस्वती सभ्यता के नाप-तौल के साधन (बाट प्रणाली) की क्या विशेषताएँ थी? वर्तमान समय में इसकी क्या प्रासंगिकता है?
उत्तर:  सिन्धु सभ्यता के लोग विनिमय (लेन – देन) हेतु नाप -तौल के लिए बाटों का प्रयोग करते थे। बाट सामान्यतया चर्ट, जैसार वे अगेट के बने होते थे। बाट प्रायः घनाकार व गोलाकार होते थे और इन पर निशान नहीं होते थे। इन बाटों के निचले मानदण्ड द्विआधारी (1, 2, 4, 8, 16, 32 इत्यादि 12800 तक) थे, जबकि ऊपरी मानदण्ड दशमलव प्रणाली के अनुसार थे। छोटे बाटों का प्रयोग सम्भवतः आभूषणों और मनकों को तौलने हेतु किया जाता था।

सिन्धु सभ्यता में बाट जिसे अनुपात में प्रयुक्त होते थे उसी अनुपात में वर्तमान में भी होते हैं। सिन्धु सभ्यता के सभी नगरों में माप, तौल, प्रणाली एक समान थी। वर्तमान में भी माप तौल प्रणाली पूरे देश में एक समान है। निश्चित ही माप तौल प्रणाली की प्रेरणा हमें सिन्धु सभ्यता से मिली होगी। सिन्धु सभ्यता की माप तौल प्रणाली आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। जितनी उस समय थी।

प्रश्न 16. सिन्धु सभ्यता की धातु कला के विषय में संक्षेप में आलेख लिखिए।
उत्तर: सिन्धु सभ्यता आर्थिक दृष्टि से उन्नत अवस्था में थी, इस बात का प्रमाण यहाँ की विकसित धातु कला से मिलता है। हमें सोना, चाँदी, ताँबा, काँसे तथा टिन इत्यादि सामग्री अवशेष पर्याप्त मात्रा में प्राप्त हुई है। मोहनजोदड़ो में एक कूबड़दार बैल का खिलौना तथा कांसे की नर्तकी की मूर्ति प्राप्त हुई है।

इन सबके साथ ही ताम्र उपकरणों में मछली पकड़ने के काँटे, आरियाँ, तलवारें, दर्पण, छेणी, चाकू, भाला, बर्तन आदि भी मिले हैं। चन्हुदड़ों धातु गलाने का मुख्य स्थान था। यहाँ मनके बनाने के लिए विभिन्न धातुओं को गलाया जाता था। ये सभी तथ्य स्पष्ट करते हैं कि सिन्धु सरस्वती सभ्यता की धातु कला अत्यन्त विकसित अवस्था में थी।

प्रश्न 17. सिन्धु सरस्वती सभ्यता की धार्मिक व्यवस्था के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:  पुरातत्वविदों की उत्खनन में पर्याप्त सामग्री प्राप्त हुई है जिसके आधार पर इतिहासकार सुगमता से इतिहास का निर्धारण कर सकते हैं। सिन्धु सभ्यता से हमें पर्याप्त मात्रा में मातृदेवी की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। एक मूर्ति के गर्भ से पौधा निकल रहा है जिससे पता चलता है सम्भवतः यह पृथ्वी माता का रूप है। इस सभ्यता की धार्मिक परम्पराओं में मातृदेवी की उपासना, पशुपतिनाथ की पूजा, वृक्ष पूजा, मूर्ति पूजा, जल की पवित्रता, तप, योग तथा पशु-पक्षियों की पूजा का प्रचलन था।

प्रश्न 18. आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं कि हड़प्पा सभ्यता का धर्म आज भी भारतीय धार्मिक जीवन में परिलक्षित होता है?
उत्तर: हुम इस कथन से पूरी तरह से सहमत है कि हड़प्पा सभ्यता का धर्म आज भी भारतीय धार्मिक जीवन में परिलक्षित होता है। ऐसा इसलिए है कि हड़प्पा सभ्यता में लोग मातृदेवी, आद्य शिव,वृक्षों, पशुओं आदि की पूजा करते थे जिनके स्पष्ट प्रमाण हमें हड़प्पा सभ्यता के अवशेषों से प्राप्त होते हैं। आज भी हिन्दू धर्म में लोग आद्य शिव, वृक्षों (जैसे- पीपल, तुलसी) तथा कुछ पशुओं (जैसे गाय) को पवित्र मानकर उनकी पूजा करते हैं। कई जगहों पर लोग नागों की भी पूजा करते हैं, जिसका साक्ष्य भी सिन्धु घाटी के नगरों में प्राप्त होता है।

प्रश्न 19. भारतीय सभ्यता पर सिन्धु सरस्वती सभ्यता का क्या प्रभाव है?
उत्तर: भारतीय सभ्यता पर सिन्धु घाटी की सभ्यता का व्यापक प्रभाव है। सिन्धु घाटी सभ्यता के कुछ प्रभाव हमारे आज के जीवन में स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होते हैं-

  1. धार्मिक समानता – सिन्धु सभ्यता के पूज्नीव पशुपति शिव, मातृदेवी की पूजा, बैल तथा अन्य पशुओं की उपासना, जल की पवित्रता, धार्मिक अवसरों पर स्नान, ये सभी परम्पराएँ आज भी भारतीय जीवन में परिलक्षित होती हैं।
  2. आभूषण एवं श्रृंगार – सिन्धु सभ्यता में स्त्री एवं पुरुष दोनों ही आभूषण प्रेमी थे। प्राप्त अवशेषों में जो आभूषण मिले हैं उनमें गले के आभूषण, पैरों की पायल, करधनी आदि प्रमुख हैं जो आज भी स्त्रियाँ अपनी सज्जा के लिए प्रयोग करती हैं।
  3. नगर नियोजन – आधुनिक नगरों के अनुसार सिन्धु घाटी के नगर भी योजना के अनुसार बनाए जाते थे। चौड़ी सड़कें और गलियाँ, जल निस्तारण की व्यवस्था, सार्वजनिक मालगोदाम, स्नानागार आदि इस बात के साक्ष्य हैं।
  4. निवास स्थान – सिन्धु सभ्यता के भवनों में आज की भाँति प्रवेश द्वार, आँगन, स्नानगृह, सीढ़ियाँ आदि होती थीं।

प्रश्न 20. नगर नियोजन तथा धर्म को छोड़कर सिंधु सभ्यता का ऐसा कौन-सा पहलू है जिससे न केवल भारत बल्कि विश्व के सभी देश प्रेरणा ले सकते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:  सिन्धु सभ्यता के नगर नियोजन तथा धर्म से भारत लोग प्रेरणा तो ले ही सकते हैं। एक अन्य पहलू भी है। जिससे न केवल भारत बल्कि विश्व के सभी देश भी प्रेरणा ले सकते हैं। पहलू हैं शांति सिन्धु सभ्यता एक शांति प्रिय सभ्यता थी। सिन्धु सभ्यता निवासियों ने अपने समय का अधिकांश उपयोग सामाजिक आर्थिक उन्नति के लिए किया। सिन्धु सभ्यता के निवासियों ने अपने समय का उपयोग युद्ध एवं हिंसक गतिविधियों में न करके अपने जीवन स्तर को उन्नत बनाने के लिए किया।

आज विश्व में अशांति का वातावरण उत्पन्न हो रहा है। हिंसक तथा आतंकवादी गतिविधियों ने अनेक देशों को ऐसी स्थिति में ला दिया है जहाँ शांति की परम आवश्यकता है। इस सम्दर्भ में भारत एवं विश्व के देश सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों से प्रेरणा ले सकते हैं तथा अपने देशवासियों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने का प्रयास कर सकते हैं।

प्रश्न 21. वेद क्या हैं और कितने हैं? प्रत्येक का वर्णन कीजिए।
उत्तर: वेद संसार के प्राचीनतम संस्कृत भाषा में रचे गये ग्रंथ हैं। वेदों की गिनती विश्व के सर्वश्रेष्ठ साहित्य में की जाती है। वेद ज्ञान के समृद्ध भण्डार हैं। वेदों के द्वारा हमें सम्पूर्ण आर्य सभ्यता व संस्कृति की जानकारी मिलती है। वेदों को अपौरुषेय कहा गया है। हमारे ऋषियों ने लम्बे समय तक जिस ज्ञान का साक्षात्कार किया उसका वेदों में संकलन किया गया है। इसलिए वेदों को संहिता भी कहा गया है। वेदों की संख्या चार है-ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।

  1. ऋग्वेद – आर्यों का सबसे प्राचीनतम् ग्रंथ ऋग्वेद है। इसमें 10 अध्याय और 1028 सूक्त हैं। इसमें छन्दों में रचित देवताओं की स्तुतियाँ हैं। प्रत्येक सूक्त में देवता व ऋषि का उल्लेख है। कुछ सूक्तों में युद्धों व आचार-विचारों का वर्णन है।
  2. सामवेद – सामवेद में काव्यात्मक ऋचाओं का संकलन है। इसके 1801 मंत्रों में से केवल 75 मंत्र नये हैं शेष ऋग्वेद के हैं। ये मंत्र यज्ञ के समय देवताओं की स्तुति में गाये जाते हैं।
  3. यजुर्वेद – यजुर्वेद में यज्ञों, कर्मकाण्डों व अनुष्ठान पद्धतियों का संग्रह है। इसमें 40 अध्याय हैं एवं शुक्ल व कृष्ण यजुर्वेद के दो भाग हैं।
  4. अथर्ववेद – अन्तिम वेद अथर्ववेद में 20 मण्डल 731 सूक्त और 6000 मंत्र हैं। इसकी रचना अथर्व ऋषि द्वारा की गयी थी। इसको अन्तिम अध्याय ईशोपनिषद है जिसका विषय आध्यात्मिक चिन्तन है।

प्रश्न 22. वैदिक काल की राजनैतिक व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
उत्तर: वैदिक काल में व्यवस्थित राजनैतिक जीवन की शुरूआत हो चुकी थी। वैदिक समाज की सबसे छोटी राजनैतिक इकाई कुल तथा सबसे बड़ी इकाई राष्ट्र थी। राष्ट्र – जन – विश – ग्राम – कुल राजनैतिक संगठन का अवरोही क्रम था। एक राष्ट्र,में कई जन थे। कुल का मुखिया कुलुप, ग्राम का मुखिया ग्रामणी, विश का अधिकारी विशपति, जन का मुखिया गोप तथा राष्ट्र का मुखिया राजा था।

राजा को पद वंशानुगत होता था। लोक कल्याणकारी राज्य का स्वरूप उस समय भी दिखाई देता है। राजा को राज्याभिषेक के समय प्रजा हित की शपथ लेनी होती थी। जनता राजा को कर देती थी जिसे बलिहृत कहा जाता था। राजा के प्रशासनिक कार्यों में सहयोग के लिए पुरोहित व सेनानी होते थे। राजा की निरंकुशता पर अंकुश लगाने वाली सभा तथा समिति दो संस्थाएँ थीं।

प्रश्न 23. सभा व समिति में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: समिति-समिति एक आम जन प्रतिनिधि सभा होती थी जिसमें महत्वपूर्ण राजनैतिक एवं सामाजिक विषयों पर विचार होता था। समिति सभा की तुलना में बड़ी संस्था थी जिसकी बैठकों में राजा भी भाग लेता था।

सभा: समिति की तुलना में सभा छोटी संस्था थी जिसमें विशिष्ट व्यक्ति ही भाग लेते थे। ऋग्वेद में सुजात (कुलीन या श्रेष्ठ) व्यक्तियों की सभा का उल्लेख है। सभा अनुभवी, वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित व्यक्तियों की संस्था थी जो राजा को परामर्श देने के साथ न्याय कार्य में सहयोग करती थी।

प्रश्न 24. सोलह महाजनपद तथा उनकी राजधानियों के नाम लिखिए।
उत्तर: बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय में उल्लिखित 16 महाजनपद तथा उनकी राजधानियाँ निम्न प्रकार थीं-

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प्रश्न 25. बौद्ध साहित्य में वर्णित दस गणराज्यों के नाम लिखिए।
उत्तर: महाजनपद काल में दस राज्यों में गणतन्त्रात्मक शासन प्रणाली थी। ये राज्य इस प्रकार थे-

  1. कपिलवस्तु के शाक्य
  2. रामग्राम के कोलिय
  3. पिप्पलिवन के मोरिय
  4. मिथिला के विदेह
  5. पावा के मल्ल
  6. कुशीनगर के मल्ल
  7. अलकप्प के बुलि
  8. वैशाली के लिच्छवि
  9. सुसुमारगिरि के भग्ग
  10. केसपुत्त के कालाम।

प्रश्न 26. ऋग्वेद के अनुसार वर्ण व्यवस्था के अन्तर्गत चार वर्षों की उत्पत्ति किस प्रकार हुई?
उत्तर: प्राचीन भारतीय समाज वर्ण व्यवस्था पर आधारित था। वर्ण व्यवस्था में लोग चार वर्षों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में विभाजित थे। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के दसवें मण्डल के अनुसार वर्ण व्यवस्था के चार वर्षों की उत्पत्ति आदिमानव परम पुरुष से हुई है। उसके मुख से ब्राह्मण, उसकी भुजाओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य एवं पैरों से शूद्र की उत्पत्ति हुई। इन वर्गों का मुख्य आधार व्यवसाये था।

प्रश्न 27. बौद्धों ने ब्राह्मणों द्वारा स्थापित वर्ण व्यवस्था की किस प्रकार आलोचना की?
उत्तर: जिस समय समाज के ब्राह्मणीय दृष्टिकोण को धर्मसूत्रों एवं धर्मशास्त्रों में संहिताबद्ध किया जा रहा था, उस समय कुछ अन्य धार्मिक परम्पराओं ने वर्ण व्यवस्था की आलोचना की। लगभग छठी शताब्दी ई. पू. में आरम्भिक बौद्ध धर्म में ब्राह्मणों द्वारा स्थापित वर्ण व्यवस्था की आलोचना प्रस्तुत की गई।

यद्यपि बौद्धों ने इस बात को तो स्वीकार किया कि समाज में विषमताएँ मौजूद होती हैं परन्तु उनके अनुसार ये भेद प्राकृतिक नहीं थे और न ही स्थायी। उन्होंने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को भी अस्वीकार कर दिया।

प्रश्न 28. क्या आप इस बात को मानते हैं कि आज भी भारतीय समाज में जाति प्रथा के कुछ तत्व विद्यमान हैं?
उत्तर: यह बात पूरी तरह सत्य है कि आज भी भारतीय समाज में जाति प्रथा के कुछ तत्व विद्यमान हैं। वर्तमान युग आधुनिकता का युग है। आधुनिकता की इस दौड़ में हम बहुत – सी चीजों को पीछे छोड़ आये हैं। परन्तु बहुत-सी चीजें ऐसी भी हैं जो आज भी भारतीय समाज में विद्यमान हैं। जाति प्रथा उनमें से एक है।

शहरों में तो जाति प्रथा के अधिक उदाहरण नहीं देखने को मिलते परन्तु आज भी भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में जाति प्रथा के तत्व देखे जा सकते हैं। बेशक आज का समाज कितना ही विकसित क्यों न हो गया हो परन्तु हम दकियानूसी एवं रूढ़िवादी प्रथाओं से अपना पीछा नहीं छुड़ा पाये हैं।

प्रश्न 29. प्राचीन समाज में प्रचलित आश्रम व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
उत्तर:व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन को एक आदर्श परिधि में व्यक्त करते हुए उसके जीवन की गति को चार आश्रमों में विभाजित किया गया। मनुष्य से यह अपेक्षा की गई कि वह जीवन के इन चार  सोपानों – ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व संन्यास आश्रम को पार करते हुए अपने जीवन के चरम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त करेगा।

मनुष्य ब्रह्मचर्य आश्रम में धर्म से परिचित होता था, शिक्षा प्राप्त कर उसकी साधना करता था, गृहस्थाश्रम में धर्मरत होकर अर्थ और काम को प्राप्त करता था, वानप्रस्थ में वह पूरा समय समाज कार्य के लिए लगाता था तथा संन्यास में वह मोक्ष प्राप्ति के लिए साधना करता था। आश्रम व्यवस्था का मुख्य लक्ष्य, भौतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक व नैतिक लक्ष्यों को समान रूप से समन्वयीकरण था।

प्रश्न 30. पुरुषार्थ की परिभाषा देते हुए स्पष्ट कीजिए कि इनका सम्बन्ध किससे है?
उत्तर: पुरुषार्थ से तात्पर्य उन आदर्शों से है जिनका अनुसरण मनुष्य को अपने जीवन में करना चाहिए। भारत में मानव के अनुसरण करने योग्य मूल्यों का वर्गीकरण चार पुरुषार्थ के रूप में किया गया है

  1. धर्म – धर्म का सम्बन्ध सदाचार, कर्तव्य पालन तथा सद्गुण से है।
  2. अर्थ – अर्थ का सम्बन्ध मनुष्य की भौतिक समृद्धि व उपभोग से है।
  3. काम – काम का सम्बन्ध सुख के उपभोग से है।
  4. मोक्ष – मोक्ष का सम्बन्ध सांसारिक जीवन से मुक्त होने अर्थात् अध्यात्म से है।

भारतीय संस्कृति में पुरुषार्थ का दर्शन सम्पूर्ण जीवन दृष्टि से है जिसमें लौकिक जीवन के विभिन्न पक्षों के साथ-साथ व्यक्ति के पारलौकिक अथवा आध्यात्मिक सम्बन्ध भी सम्मिलित हैं।

प्रश्न 31. भारतीय संस्कृति में कितने ऋणों का उल्लेख किया गया है?
उत्तर: ऋण की अवधारणा भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण भाग है। ऋग्वेद में लौकिक एवं पारलौकिक दोनों सन्दर्भ में मनुष्य के ऋणों की चर्चा की गयी है। भारतीय ऋषियों ने तीन ऋणों की व्यवस्था की है। ये ऋण हैं-देव ऋण, ऋषि ऋण व पितृ ऋण। इन ऋणों से मुक्त होने पर ही मुक्ति सम्भव है। ये ऋण मनुष्य के सामाजिक दायित्वों से सम्बन्धित हैं

  1. पितृ ऋण – सन्तानोत्पत्ति के द्वारा मानव जाति की निरन्तरता बनाकर हम पितृ ऋण की पूर्ति कर सकते हैं।
  2. ऋषि ऋण – जो ज्ञान हमें ऋषियों से मिलता है और जिस ज्ञान की परम्परा के हम उत्तराधिकारी हैं, उस ज्ञान और परम्परा का संवर्द्धन करके ऋषि ऋण की पूर्ति कर सकते हैं।
  3. देव ऋण – देवताओं से सम्बद्ध दायित्व जिसे यज्ञादि से पूरा किया जाता है। यह ऋण मनुष्य को सृष्टि से जोड़ता है।

अतः मनुष्य को समस्त प्राणियों कीट-पतंगों, पशु-पक्षियों को भोजन व सूर्य चन्द्र की स्तुति कर सृष्टि की निरन्तरता में योगदान करना चाहिए।

प्रश्न 32. भारतीय संस्कृति में आवश्यक पंच महायज्ञ कौन-कौन से हैं?
उत्तर: भारतीय संस्कृति में प्रत्येक गृहस्थ के लिए पंच महायज्ञों का प्रावधान है-

  1. ब्रह्म या ऋषि यज्ञ – स्वाध्याय व ऋषि के विचारों का अनुशीलन करना।
  2. देव यज्ञ – देवताओं की यज्ञ करके स्तुति करना, पूजा करना, प्रार्थना करना एवं वन्दना करना।
  3. पितृ यज्ञ – माता-पिता की सेवा करना तथा गुरु, आचार्य एवं वृद्धजन का सम्मान व सेवा करना।
  4. भूत यज्ञ – विभिन्न प्राणियों पशु पक्षियों, गाय, कौआ, चींटी, कुत्ता को भोजन कराकर संतुष्ट करना एवं अतिथियों की सेवा करना।
  5. नृप यज्ञ – सम्पूर्ण मानव मात्र के कल्याण के लिए कार्य करना।

प्रश्न 33. उपनिषदों के दार्शनिक विचारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: उपनिषदों के दार्शनिक विचारों द्वारा आत्मा, परमात्मा, कर्म, जीवन के अर्थ, जीवन की सम्भावना पुनर्जन्म तथा मोक्ष आदि की विवेचना हुई है। इस विचार के अनुसार आत्मा, अगाध, अपार, अवर्णनीय एवं सर्वव्यापक है। सभी तत्व इस आत्मा में ही समाहित हैं। यह आत्मा ही ब्रह्म है तथा यही सर्वव्यापक है। अतः मानव जीवन का लक्ष्य आत्मा को परमात्मा में विलीन कर स्वयं परमब्रह्म को जानना है।

निबन्धात्मक प्रश्न[/su_heading]

 

प्रश्न 1. प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी में साहित्यिक स्रोतों की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर: इतिहासकार समाज में हुए परिवर्तनों को समझने और इतिहास की पुनः रचना करने के लिए साहित्यिक स्रोतों का उपयोग करते हैं। इन स्रोतों के आधार पर वे विश्वसनीय विवरण तैयार करते हैं। इतिहास की उन्हीं घटनाओं को तथ्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है जो प्रमाणों से सिद्ध हों। साहित्यिक स्रोत भारतीय इतिहास की जानकारी प्राप्त करने के महत्वपूर्ण साधन हैं। प्राचीन भारतीय इतिहास के साहित्यिक स्रोतों को अग्रांकित तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है।

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धार्मिक साहित्य: प्राचीन भारतीय धर्मों से सम्बन्धित जो साहित्य रचा गया उसे धार्मिक साहित्य कहा जाता है। इनमें प्रमुख ब्राह्मण साहित्य बौद्ध व जैन साहित्य है।

(क) ब्राह्मण साहित्य – इनमें सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ वेद हैं। इनकी संख्या चार है-ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद व अथर्ववेद। प्रत्येक वेद के चार भाग हैं-संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् वैदिक साहित्य को ठीक तरह से समझने के लिए वेदांग साहित्य की रचना की गई। इसके छ: भाग हैं-शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द एवं ज्योतिष। वेदों के चार उपवेद हैं-आयर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्ववेद व शिल्प, वेद इनसे चिकित्सा, वास्तुकला, संगीत, सैन्य विज्ञान आदि की जानकारी प्राप्त होती है।

(ख) बौद्ध साहित्य – बौद्ध साहित्य में सबसे प्राचीन ग्रन्थ त्रिपिटिक है। इनमें बौद्ध धर्म के नियम व आचरण संगृहीत हैं। अन्य बौद्ध ग्रंथों जैसे-मिलिन्दपन्हों, दीपवंश, महावंश, महावस्तु ग्रंथ, ललित विस्तार, मंजुश्री, मूलकल्प, अश्वघोष का बुद्धचरित्र, सौंदर्यानन्द काव्य, दिव्यावदान एवं जातक ग्रंथों से बौद्ध धर्म व गौतम बुद्ध के जीवन चरित्र की जानकारी मिलती है।

(ग) जैन साहित्य – जैन साहित्य में आगम सबसे प्रमुख हैं। जैन साहित्य प्राकृत भाषा में रचित हैं अन्य जैन ग्रंथों में। कथाकोष, परिशिष्टपर्वन, भद्रबाहुचरित, कल्पसूत्र, भगवती सूत्र, आचरांगसूत्र आदि प्रमुख हैं जिनसे ऐतिहासिक विवरण प्राप्त होता है।

मैतर साहित्य: इस साहित्य के अन्तर्गत धर्म के अतिरिक्त अन्य विषयों पर लिखे गये ग्रंथ आते हैं, जैसे

(i) ऐतिहासिक ग्रंथ:
प्रमुख ऐतिहासिक ग्रंथों में 1150 ई० में लिखी गई कल्हण की राजतरंगिणी एवं कौटिल्य का अर्थशास्त्र प्रमुख है। ये ग्रंथ तत्कालीन शासकों एवं उनकी शासन पद्धतियों का उचित ब्यौरा देते हैं। अन्य प्रमुख ग्रंथ हैं-बाणभट्ट का हर्षचरित, वाक्पति का गौढवहो, विल्हण का विक्रमांकदेव चरित, जयसिंह का कुमारपाल चरित, जयचन्द का हम्मीर महाकाव्य, पद्मगुप्त का नवसहसांक चरित्र, बल्लाल का भोज चरित एवं जयानक की पृथ्वीराज विजय आदि।

(ii) विशुद्ध साहित्यिक ग्रंथ:
इनके तहत अनेक नाटक, व्याकरण ग्रंथ, टीका, काव्य, कथा-साहित्य एवं कोष की , रचना की गई जो उस समय के शासकों, सामाजिक एवं आर्थिक जीवन को जानने का प्रमुख स्रोत हैं। इनमें प्रमुख हैं-पाणिनी .. का अष्टाध्यायी, पतंजलि का महाकाव्य, कालिदास का मालविकाग्निमित्र, विशाखदत्त का मुद्राराक्षस, शूद्रक को मृच्छकटिकम्, मेघातिथि की मिताक्षरा के कामन्दक का नीतिसार। कथा साहित्य कोष की दृष्टि से विष्णु शर्मा का पंचतंत्र, क्षेमेन्द्र की वृहतकथामंजरी, गुणाढ्य की कथा-मंजरी, सोमदेव की कथासरित्सागर, अमरसिंह का अमरकोष प्रमुख हैं।

(iii) क्षेत्रीय साहित्य:
क्षेत्रीय साहित्य ग्रंथों में धूर्जटि द्वारा रचित तेलगू ग्रंथ कृष्णदेवराय विजयुम, विजय नगर के शासक कृष्णदेवराय के सम्बन्ध में जानकारी देता है। राजस्थानी भाषा के ग्रंथों में चन्दबरदाई का पृथ्वीराज रासो, पद्मनाभ का कान्हड़दे प्रबन्ध, बीठू सूजा का राव जैतसी रो छन्द, सूर्यमल मिसण का वंश भास्कर, नैणसी का नैणसी की ख्यात बांकीदास की ख्यात आदि प्रमुख हैं।

(iv) विदेशी विवरण:
विदेशी लेखक भी भारत की सांस्कृतिक व आर्थिक उपलब्धियों से प्रभावित हुए तथा उन्होंने अपने लेखों में भारत के सम्बन्ध में पर्याप्त विवरण दिया है। यूनानी साहित्य में मेगस्थनीज की इंडिका, टॉलमी का भूगोल, प्लिनी दि एल्डर की नेचुरल हिस्ट्री, एरिस्टोब्यूलस की हिस्ट्री ऑफ दी वार’, स्ट्रेबो का भूगोल आदि रचनाएँ महत्वपूर्ण हैं। चीनी विवरणों में फाह्यान, ह्वेनसांग, सुंगयुन तथा इत्सिग चीनी यात्रियों के विवरणों से तत्कालीन शासन व्यवस्था के सम्बन्ध में पर्याप्त जानकारी मिलती है।

तिब्बती वृत्तान्त में तारानाथ द्वारा रचित कंग्यूर व तंग्यूर ग्रंथों को उपयोगी माना गया है। अरबी यात्रियों के विवरण में मसूदी की पुस्तक ‘मिडास ऑफ गोल्ड’ सुलेमान नवी की पुस्तक सिलसिलात-उल-तवारीख तथा अलबरुनी की पुस्तक तारीख-ए-हिन्द में भारतीय समाज व संस्कृति सम्बन्धी जानकारी मिलती है।

वंशावलियाँ:
वंशावली लेखन परम्परा व्यक्ति के इतिहास को शुद्ध रूप से सहेज कर रखने की प्रणाली है। वंशावलियाँ एक न्यायिक दस्तावेज हैं, जो व्यक्ति की परम्परा, संस्कृति, मूल निवास, विस्तार, वंश, कुलधर्म, कुलाचार, गोत्र व पूर्वजों के नाम आदि प्राप्त करने का सर्वाधिक विश्वसनीय स्रोत हैं। वंशावली लेखन परम्परा की शुरूआत वैदिक ऋषियों द्वारा समाज को सुसंगठित एवं सुव्यवस्थित करने की दृष्टि से की गई थी जो हजारों वर्षों से आज भी अनवरत जारी है।

प्रश्न 2. इतिहास के विश्वसनीय स्रोत के रूप में यूनानी साहित्य, चीनी विवरण व तिब्बती वृत्तान्त का वर्णन कीजिए।
उत्तर: इतिहास के विश्वसनीय स्रोत के रूप में यूनानी साहित्य, चीनी विवरण व तिब्बती वृत्तान्त का क्रमशः वर्णन निम्नलिखित है

1. यूनानी साहित्य:
यूनानी लेखकों में टेसियस, हेरोडोटस, निर्याकस, एरिस्टोब्युलस, आनेक्रिट्स, स्ट्रेबो, एरियन एवं स्काई लेक्स प्रमुख हैं। सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुस्तक चन्द्रगुप्त के दरबार में यूनानी राजदूत मेगस्थनीज द्वारा लिखित ‘इंडिका’ है। यूनानी विवरणों से चन्द्र गुप्त मौर्य के प्रशासन, समाज एवं आर्थिक स्थिति के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है। यूनानी साहित्य में टॉलमी का भूगोल, प्लिनी दी एल्डर की नेचुरल हिस्ट्री, एरिस्टोब्यूलस की हिस्ट्री ऑफ दी वार’ स्ट्रेबो का भूगोल आदि विशेष उल्लेखनीय है। ‘पेरीप्लस ऑफ दी एरिथ्रीयन सी’ पुस्तक में बन्दरगाहों व व्यापार का विस्तृत विवरण है।

2. चीनी विवरण:
चीनी यात्रियों में फाह्यान, सुंगयुन, ह्वेनसांग एवं इत्सिग का वृत्तान्त महत्वपूर्ण है। फाह्यान गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त II के समय (399 – 414 ई.) भारत आया था। ह्वेनसांग को ‘यात्रियों का राजकुमार’ कहा जाता है। उसने नालन्दा विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण की। वह हर्षवर्धन के राज्य काल में 629 ई. से 644 ई. में भारत आया था और उसने अपनी पुस्तक सीयूकी में भारत के समकालीन इतिहास का वर्णन किया है। इत्सिग ने सातवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 672 से 688 ई. तक भारत भ्रमण किया। इससे नालन्दा, विक्रमशिला विश्वविद्यालय के साथ ही भारतीय संस्कृति व समाज की भी जानकारी मिलती है।

3. तिब्बती वृत्तान्त:
तिब्बती वृत्तान्त में तारानाथ द्वारा रचित कंग्यूर वे तंग्यूर ग्रन्थों को उपयोगी माना गया है। अरबी यात्री और भूगोलवेत्ताओं ने भी भारत के सम्बन्ध में जानकारी दी है। मसूदी ने अपनी पुस्तक ‘मिडास ऑफ गोल्ड’ में भारत का विवरण,दिया है और लिखा है कि भारत का राज्य स्थल व समुद्र दोनों पर था। सिन्ध के इतिहास ‘चचनामा’ में तथा सुलेमान नवी की पुस्तक ‘सिलसिलात-उल-तवारीख’ में पाल – प्रतिहार शासकों के बारे में लिखा है।

अरबी लेखकों में अल्बेरूनी (तारिख ए हिन्द) सबसे महत्वपूर्ण है, जिसने संस्कृत भाषा सीखी व मूल स्रोतों का अध्ययन करके अपनी पुस्तक तारीख-उल-हिन्द में भारतीय समाज व संस्कृति के बारे में लिखा है। उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि इतिहास के विश्वसनीय स्रोत के रूप में यूनानी साहित्य चीनी विवरण, तिब्बती वृत्तान्त अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 3. पाषाण काल किसे कहते हैं तथा इसे कितने भागों में बाँटा गया है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर: मानव के उद्भव एवं उसके विकास के प्रत्येक काल को उस समय प्रचलित औजारों तथा उपकरणों के आधार पर विभाजित किया गया है क्योंकि ये ही उस काल के इतिहास को जानने के प्रमुख साधन हैं। पाषाण काल में मानव ने पत्थर के टुकड़े को तोड़-फोड़कर तथा काँट-छाँटकर उनसे उपकरण बनाये। पाषाण निर्मित उपकरणों की अधिकता के कारण ही प्रथम काल को पाषाण काल कहा जाता है। पाषाण काल को सामान्यतः अग्र तीन प्रमुख उपविभागों में विभाजित किया गया है।

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1. पुरा पाषाण काल:
पुरा पाषाण काल के उपकरण 20 लाख वर्ष पूर्व मानव ने प्रथम बार बनाये थे जो आकार में बड़े व मोटे हैं, पर सुगढ़ नहीं हैं। भारतीय पुरापाषाण युग के मानव द्वारा प्रयोग किये जाने वाले पत्थर के औजारों को स्वरूप तथा जलवायु परिवर्तन के आधार पर तीन अवस्थाओं में बाँटा जाता है। पहली अवस्था को निम्न पुरा पाषाण युग, दूसरी को मध्य पुरा पाषाण युग और तीसरी को उच्च पुरा पाषाण युग कहते हैं।

2. मध्य पाषाण काल:
प्रस्तर युगीन संस्कृति में एक मध्यवर्ती अवस्था आयी जो मध्य पाषाण युग कहलाती है। इस युग में पत्थरों का आकार छोटा होता गया। लघु आकार के कारण इन्हें सूक्ष्म पाषाण,उपकरण कहते हैं। इस समय का मानव आखेटक, खाद्य संग्राहक अवस्था में रहने लगा और पशुपालन की ओर अग्रसर हुआ तथा नदी के तटों व झीलों के किनारे लकड़ी व घासफूस से बनी गोल झोंपड़ियों में रहने लगा। इस युग में मिट्टी के पात्रों का भी उपयोग होने लगा तथा खाद्य सामग्री को भी पकाया जाने लगा।

3. नव पाषाण काल:
नव पाषाण काल का मानव पशुपालन व कृषि कार्य की ओर अग्रसर हुआ। इस समय लोगों ने ऐसे उपकरण बनाना शुरू किया जो कृषि कार्य व पशुपालन के लिए उपयोगी सिद्ध हुए। इनमें मुख्य रूप से कुल्हाड़ियाँ, वसूला, छिद्रित वृत्त, हथौड़ा, सिललोढ़, ओखली आदि सम्मिलित थे। ये उपकरण बेसाल्ट जैसे कठोर पत्थर के थे जिन्हें घिसकर चिकना किया जाता था। कृषि कार्य ने धीरे – धीरे मानव को एक जगह बसने को विवश कर दिया। इसी के साथ आर्थिक व सांस्कृतिक विकास के नये युग का आरंभ हुआ।

प्रश्न 4. सिन्धु सभ्यता की खोज में पुरातत्वविदों का योगदान एवं सिंधु सभ्यता के विस्तार – क्षेत्र का वर्णन कीजिए।
उत्तर: भारत की सिन्धु नदी की घाटी में विश्व की सबसे प्राचीनतम सभ्यता फल – फूल रही थी। इस सभ्यता के नष्ट हो जाने के हजारों वर्षों के बाद जब लोगों ने इस क्षेत्र में रहना शुरू किया तो उन्हें अनेक पुरावस्तुएँ प्राप्त हुईं। यही पुरावस्तुएँ हड़प्पा सभ्यता की खोज को आधार बनीं। बीसवीं सदी के प्रारम्भिक दशकों में पुरातत्वविद् दयाराम साहनी ने हड़प्पा स्थल का उत्खनन किया। 1922 ई. में राखालदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो का पता लगाया।

हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो से प्राप्त अवशेषों की समानता के आधार पर पुरातत्वविदों ने अनुमान लगाया कि यह दोनों पुरास्थल एक ही संस्कृति के भाग थे। हड़प्पा की खोज सबसे पहले हुई इसलिए इसे हड़प्पा सभ्यतो कहा गया। इस सभ्यता के प्रारम्भिक स्थल सिन्धु नदी के आस-पास थे अतः इसे प्रारम्भ में सिन्धु घाटी सभ्यता कहा गया था परन्तु इस सभ्यता का सर्वाधिक भौगोलिक एवं सांस्कृतिक विस्तार पंजाब, हरियाणा, राजस्थान व गुजरात में लुप्त सरस्वती नदी घाटी क्षेत्र में मिलता है।

अतः इसे सिन्धु सरस्वती सभ्यता का नाम दिया जाना सर्वथा उचित है। पुरातत्वविदों की निरन्तर खोजों के परिणामस्वरूप केवल भारतीय उपमहाद्वीप में ही इसे सभ्यता से सम्बन्धित लगभग 1400 पुरास्थल प्राप्त हो चुके हैं। इनमें से लगभग 917 स्थल भारत में तथा 481 स्थल पाकिस्तान में व 2 अफगानिस्तान में हैं। इस सभ्यता के प्रमुख पुरास्थल निम्नलिखित जगहों से प्राप्त हुए हैं-

  1. राजस्थान – कालीबंगा
  2. हरियाणा – बनावली राखीगढ़ी व मीताथल
  3. गुजरात – रंगपुर, धौलावीरा, प्रभास पाटन, खम्भात की खाड़ी
  4. महाराष्ट्र – दैमाबाद।

प्रश्न 5. सिन्धु सरस्वती सभ्यता की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: सिन्धु सरस्वती सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीनतम सभ्यता थी। यह सभ्यता एवं संस्कृति विशुद्ध भारतीय है। इस सभ्यता का उद्देश्य, रूप और प्रयोजन मौलिक एवं स्वदेशी है। उत्खनन द्वारा जो पुरातात्विक सामग्री प्राप्त हुई है उसके आधार पर सिन्धु सरस्वती सभ्यता का जो जीवन्त रूप व विशेषताएँ उभरकर सामने आयी हैं वे निम्न प्रकार हैं

1. नगर योजना:
सिन्धु सरस्वती सभ्यता के विभिन्न स्थलों के उत्खनन से उत्कृष्ट नगर नियोजन के प्रमाण प्राप्त होते हैं। यहाँ के निवासी अपने निवास एक निश्चित योजना के अनुसार बनाते थे। शासक वर्ग के लोग दुर्ग में रहते थे तथा साधारण वर्ग के लोग निश्चित निचली जगह पर रहते थे। मकान निर्माण में पक्की ईंटों का प्रयोग किया जाता था। प्रत्येक मकान में एक आँगन, रसोईघर, स्नानघर, द्वार आदि होते थे। नगरों में चौड़ी-चौड़ी सड़कें वे गलियाँ बनायी जाती र्थी जो एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। नगरों में गन्दे पानी के निकास की उचित व्यवस्था थी। इस सभ्यता में कई विशिष्ट भवन मिले हैं जो इस सभ्यता के उत्कृष्ट नगर नियोजन को दर्शाते हैं, जिनमें मोहनजोदड़ो का मालगोदाम, विशाल स्नानागार तथा हड़प्पा का विशाल अन्नागार प्रमुख हैं।

2. सामाजिक जीवन:
सिन्धु सभ्यता के समाज में शासक व महत्वपूर्ण कर्मचारी वर्ग, सामान्य वर्ग, श्रमिक वर्ग एवं कृषक वर्ग था। समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार था। मातृदेवी की मिट्टी की प्राप्त मूर्तियों से समाज में नारी का महत्व व परिवार के मातृसत्तात्मक होने का प्रमाण मिलता है। यहाँ स्त्री और पुरुष दोनों ही आभूषण प्रेमी थे। एक मुद्रा पर ढोलक का चित्र बना है जो सिंधु-सरस्वती सभ्यतावासियों की वाद्य कला में रुचि को दर्शाता है।

3. धार्मिक जीवन:
सिन्धु सरस्वती सभ्यता के लोग धार्मिक विचारों के थे। ये मातृदेवी की पूजा करते थे तथा शिव की भी उपासना करते थे। इसके अतिरिक्त इन लोगों में वृक्षों तथा पशुपक्षियों की पूजा भी प्रचलित थी। इनके धार्मिक जीवन में पवित्र स्नान तथा जल पूजा का भी विशेष महत्व था।

4. आर्थिक जीवन:
सिन्धु सरस्वती सभ्यता के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि थी। ये लोग गेहूँ, जौ, चावल, चना, बाजरा, दाल एवं तिल आदि की खेती करते थे। कालीबंगा से जुते हुए खेत के प्रमाण मिले हैं। इस सभ्यता के लोगों का पश्चिमी एशिया के अनेक देशों के साथ व्यापार होता था। विदेशों से व्यापार के लिए जलमार्गों का प्रयोग किया जाता था। इसके अतिरिक्त इस सभ्यता के लोग उद्योग-धन्धों में भी संलग्न थे। मिट्टी व धातु के बर्तन बनाना, आभूषण बनाना, औजार बनाना आदि उद्योग विकसित अवस्था में थे। तोल के लिए बाटों का प्रयोग किया जाता था।

5. राजनीतिक जीवन:
सिन्धु सरस्वती सभ्यता के राजनैतिक जीवन की स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती। प्रशासनिक दृष्टि से साम्राज्य के चार बड़े केन्द्र रहे होंगे-हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा व लोथल। सुव्यवस्थित नगर नियोजन स्वच्छता, जल संरक्षण आदि प्रतीकों से पूर्ण एवं कुशल राजसत्ता नियंत्रण तथा व्यवस्थित नगर पालिका प्रशासन के संकेत मिलते हैं। अस्त्र – शस्त्र अधिक संख्या में न मिलना यहाँ के निवासियों के शान्तिप्रिय होने की सूचना देते हैं।

6. लिपि:
सिन्धु सरस्वती सभ्यता के लोगों ने लिपि का भी आविष्कार किया। इस सभ्यता की लिपि भाषा चित्रात्मक थी। इस लिपि में चिन्हों का प्रयोग किया जाता था।

7. कला:
सिन्धु सरस्वती सभ्यता के लोगों ने कला के क्षेत्र में बहुत उन्नति की थी। उत्खनन से प्राप्त मुहरों एवं बर्तनों पर आकर्षक चित्रकारी देखने को मिलती है। मिट्टी से बने मृदभाण्ड, मृणमूर्तियाँ, मुहर निर्माण, आभूषण बनाना आदि इनकी उत्कृष्ट कला प्रेम के उदाहरण हैं।

प्रश्न 6. सिन्धु सरस्वती सभ्यता के नगर नियोजन की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं? वर्णन कीजिए।
उत्तर: सिन्धु सरस्वती सभ्यता की सबसे आश्चर्यजनक विशेषता इसका नगर नियोजन था। पुरातत्वविद् इस काल की नगर नियोजन की व्यवस्था को देखकर हतप्रभ हैं जो आज के वास्तुविदों की नियोजन शैली से किसी भी प्रकार कमतर नहीं है। उत्खनन में प्राप्त हुए इन नगरों के निर्माण की आधार योजना, निर्माण शैली तथा आवास व्यवस्था में विलक्षण एकरूपता प्राप्त होती है। इस नगर नियोजन की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार थीं-

1. व्यवस्थित सड़कें तथा गलियाँ:
सिन्धु सभ्यता के नगरों की सड़कें, सम्पर्क मार्ग और गलियाँ एक सुनिश्चित योजना के अनुसार निर्मित र्थी। नगर में एक-दूसरे को समकोण पर काटती हुई चौड़ी सड़कें होती थीं जिसकी चौड़ाई 9 से 34 फीट थी। गलियाँ एक से 2.2 मीटर तक चौड़ी होती थीं। कालीबंगा की सड़कें 1.8, 3.6, 5.4 व 7.2 मी. चौड़ी होती थीं।

2. नियोजित जल निस्तारण व्यवस्था:
सिन्धु घाटी सभ्यता में जल निस्तारण की व्यवस्था अति उत्तम थी। घरों के पानी का निकास नालियों से होता था। नालियाँ गन्दे पानी को नगर से बाहर पहुँचाती थीं। बड़ी नालियाँ ढंकी हुई थीं। नालियों को जोड़ने व प्लास्टर में मिट्टी, जिप्सम व चूने का प्रयोग होता था। सड़कों की नालियों में मेन होल (तरमोखें) भी मिले हैं। नालियों के बीच-बीच में चेम्बर (शोषगर्त) भी थे, जिनकी सफाई करके कूड़ा-करकट निकाल दिया जाता था।

3. व्यवस्थित आवासीय भवन:
आधुनिक गृह स्थापत्य कला के अनुसार सिन्धु सरस्वती सभ्यता के वास्तुशिल्पी आवासीय नियोजन में सुव्यवस्थित गृह स्थापत्य कला का पूरा ध्यान रखते थे। आवास एक निश्चित योजना के अनुसार ही बनाये जाते थे। प्रत्येक मकान में एक स्नानागार, आँगन और आगन के चारों ओर कमरे हुआ करते थे। शौचालय व दरवाजों, खिड़कियों आदि की भी समुचित व्यवस्था थी। मकानों के निर्माण में प्रायः पक्की ईंटों का प्रयोग होता था।

4. विशाल स्नानागार:
मोहनजोदड़ो का यह महत्वपूर्ण भवन है जिसका आकार 39 × 23 × 8 फीट है। इसमें ईंटों की सीढ़ियाँ हैं। तीन तरफ बरामदे हैं। फर्श व दीवारों पर ईंटों का प्रयोग है। पास में एक कुएँ के भी अवशेष मिले हैं जो जल का स्रोत था। उत्तर की ओर छोटे – छोटे आठ स्नानागार भी बने हुए हैं।

5. विशाल अन्नागार:
हड़प्पा व मोहनजोदड़ो से विशाल अन्नागार के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। मोहनजोदड़ो का अन्नागार 45.71 × 15.23 मीटर का है। दो खंण्डों में विभाजित हड़प्पा के अन्नागार का क्षेत्रफल 55 × 43 मीटर है जो पानी के बचाव हेतु ऊँचे चबूतरे पर बना हुआ है। प्रत्येक खण्ड में 6 – 6 की दो पंक्तियों में भण्डारण कक्ष हैं, दोनों के मध्य 23 फुट की दूरी है।

6. विशाल जलाशय व स्टेडियम:
धौलावीरा के उत्खनन से 16 छोटे – बड़े जलाशय प्राप्त हुए हैं जिनसे हमें तत्कालीन जल संग्रहण व्यवस्था की जानकारी प्राप्त होती है। दुर्ग के दक्षिण में शिला को काटकर बनाया गया 95 × 11.42 × 4 मीटर का जलाशय प्रमुख उदाहरण है। इसके अतिरिक्त धौलावीरा से ही 283 × 45 मीटर के आकार के स्टेडियम के भी प्रमाण मिले हैं।

इसके चारों तरफ दर्शकों के बैठने के लिए सोपान बने हुए हैं। समारोह स्थल दुर्ग की प्राचीर से जुड़ा हुआ है और इसकी चौड़ाई 12 मीटर है। उक्त विशेषताओं से स्पष्ट होता है कि उस काल में सिन्धु घाटी सभ्यता की नगर नियोजन कला उच्चकोटि की थी। लोगों को सभी आवश्यक सुविधाएँ प्राप्त थीं।

प्रश्न 7. सिन्धु सरस्वती सभ्यता के प्रमुख नगरों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: सिन्धु सरस्वती सभ्यता का विस्तार पश्चिम से पूर्व तक 1600 किमी. व उत्तर से दक्षिण तक 1400 किमी. था। इस सभ्यता के महत्वपूर्ण नगर निम्न प्रकार थे-

  1. मोहनजोदड़ो – मोहनजोदड़ो विश्व का सबसे प्राचीन योजनाबद्ध नगर है। यह पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त के लरकाना जिले में सिन्धु नदी के किनारे स्थित है। सन् 1922 ई० में भारतीय पुरातत्वविद् श्री राखालदास बनर्जी ने इसकी खोज की। इस नगर से एक विशाल स्नानागार मिला है जो सिन्धु सभ्यता के नगर नियोजन का महत्वपूर्ण भाग है।
  2. हड़प्पा – हड़प्पा पाकिस्तान के साहीवाल जिले में स्थित है। पुरातत्वविद् श्री दयाराम साहनी ने इस नगर की खोज 1921 ई० में की थी। हड़प्पा के नगरों की सड़कें चौड़ी होती थीं। मकान पक्की ईंटों के बने होते थे। नगर नियोजन को पूरा ध्यान रखा जाता था। इस नगर के नाम पर सिन्धु सरस्वती सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता या संस्कृति भी कहा जाता है।
  3. लोथल – लोथल भी सिन्धु घाटी सभ्यता का एक प्रमुख केन्द्र है। पुरातत्वविदों के अनुसार लोथल भारत के पश्चिमी तट पर एक प्रमुख बन्दरगाह था। यहाँ से शल्य चिकित्सा, धातु उद्योग, मनका उद्योग तथा मुहरं निर्माण आदि के प्रमाण मिले हैं।
  4. चन्हूदड़ो – वर्तमान पाकिस्तान में स्थित यह नगर शिल्पकारी के कार्यों के लिए प्रमुख केन्द्र था। यहाँ से तैयार मनके, शंख, बाट तथा मुहरें आदि बड़े नगरों में भेजी जाती थीं।
  5. कालीबंगा – राजस्थान में स्थित यह स्थल भी सिन्धु सभ्यता का महत्वपूर्ण स्थल है। यहाँ से भी नगर नियोजन के प्रमाण मिले हैं। यहाँ सड़कें 1.8, 3.6, 5.4 व 7.2 मी. चौड़ी होती थीं जो समानुपातिक ईंटों से बनी हैं। इस स्थल से जुते हुए खेत का साक्ष्य मिला है। यहाँ से अग्निकुण्ड व अग्निवेदिकाएँ भी प्राप्त हुई हैं जो धार्मिक जीवन में तप, योग व यज्ञ का प्रमाण देती हैं।

अन्य केन्द्र: इनके अतिरिक्त धौलावीरा, हरियाणा में स्थित बनावली, सुरकोटड़ा आदि सिन्धु सभ्यता के अन्य महत्वपूर्ण स्थल हैं।

प्रश्न 8. सिन्धु सरस्वती सभ्यता की धार्मिक स्थिति तथा लोगों के धार्मिक जीवन पर प्रकाश डालो।
उत्तर: सिन्धु संरस्वती सभ्यता के सम्बन्ध में निश्चित रूप से यह कहना कठिन है कि इस सभ्यता के लोगों का धर्म क्या था? कारण यह है कि हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो के उत्खनन में कोई मन्दिर या सुस्पष्ट धार्मिक सामग्री प्राप्त नहीं हुई है। खण्डहरों के उत्खननों से प्राप्त अवशेषों (मुहरों, मूर्तियों, अग्निवेदिकाएँ) की सहायता से पुरातत्वविदों ने धार्मिक स्थिति। तथा धार्मिक जीवन के बारे में अनुमान लगाए हैं-

1. मातृशक्ति की पूजा:
सिन्धु घाटी के लोग मातृ देवी या मातृ शक्ति की पूजा करते थे। हड़प्पा सभ्यता के अनेक स्थलों से मातृदेवी की मूर्तियाँ मिली हैं। इस देवी का उनके धार्मिक जीवन पर गहरा प्रभाव था। यह दैवीय शक्ति या ईश्वरी शक्ति का प्रतीक थी। हड़प्पा से प्राप्त एक मूर्ति के गर्भ से एक पौधा निकलता दिखाई देता है, संभवत: यह पृथ्वी माता का स्वरूप है। हड़प्पा सभ्यता के लोगों की मान्यता के अनुसार मातृशक्ति सभी की उत्पत्ति का स्रोत थी।

2. शिव की पूजा:
सिन्धु घाटी के लोग एक देवता की पूजा करते थे। इस सभ्यता से प्राप्त एक मुहर पर एक पुरुष आकृति पद्मासन में बैठी है। इसके एक तरफ हाथी व बाघ है दूसरी तरफ भैंसा व गेंदा है, नीचे हिरण है। एक अन्य.मुहर में योगी मुद्रा में व्यक्ति की आकृति त्रिमुखी एवं त्रिशृंगी है तथा नाग द्वारा पूजा करते हुए दिखाया गया है। इससे पशुपतिनाथ या आद्य शिव की पूजा के संकेत मिलते हैं।

3. पशुओं की पूजा:
सिन्धु घाटी के लोग बैल, शेर, बाघ व हाथी आदि पशुओं की भी पूजा करते थे। यहाँ से प्राप्त मुहरों पर एक सींग वाले वृषभ का चित्रण मिलता है। इसके अलावा कूबड़दार बैल, बिना कूबड़दार बैल, बाघ व हाथी का चित्रण मिलता है। विभिन्न पशु देवताओं के वाहन के रूप में प्रसिद्ध हुए।

4. वृक्षों की उपासना:
सिन्धु घाटी के लोग वृक्षों की भी पूजा करते थे। वृक्षों के भीतर रहने वाली आत्मा के रूप में वृक्ष पूजा को इस समय प्रचलन था। एक मुहर में देवता को दो पीपल के वृक्ष के मध्य दिखाया गया है। सात मानवाकृतियाँ उसकी पूजा कर रही हैं।

5. प्रकृति पूजा:
प्रकृति की पूजा की जाती थी। कालीबंगा, वनावली, राखीगढ़ी तथा लोथल के उत्खनन में अग्नि वेदिकाएँ प्राप्त हुई हैं, अग्निवेदियों में राख के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। इससे यज्ञ सम्बन्धी अनुष्ठान के साक्ष्य प्राप्त होते हैं। शुभ अवसरों और विशेष पर्वो और जल पूजा के साक्ष्य मोहनजोदड़ो के विशाल स्नानागार से प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 9. प्राचीन समाज़ में परिवार व्यवस्था तथा स्त्रियों की स्थिति का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर: परिवार व्यवस्था की संकल्पना भारतीय सामाजिक जीवन की महत्वपूर्ण विशेषता है। परिवार व्यवस्था ने व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़कर समाज व राष्ट्र तक पहुँचाया है। इसी भाव से हम भारतीय वसुधैव कुटुम्बकम् का विश्व – संदेश देते हैं। पुरा ऐतिहासिक युग (सिन्धु सरस्वती सभ्यता) में भी हमें परिवार की संकल्पना के अवशेष दिखाई देते हैं। अनेक संख्या में मातृ-मृणमूर्तियों के अवशेष मिले हैं जो कि उस समय के मातृसत्तात्मक परिवार का संकेत देते हैं। सिन्धु सभ्यता में स्त्रियों का आदर होता था एवं परिवार में उन्हें महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था।

स्त्रियाँ पुरुषों के साथ विभिन्न सामाजिक व धार्मिक कार्यों में भाग लेती थीं। खुदाई में जितनी मानव आकृतियों के चित्र मिले हैं उनमें अधिकांश स्त्रियों के हैं जिनसे यह प्रमाणित होता है। कि स्त्रियाँ समाज में समादृत थीं। इनका मुख्य कार्य सन्तान का लालन – पालन एवं गृह संचालन था। वैदिक काल में परिवार को कुटुम्ब कहा जाता था। उसमें दो या तीन पीढ़ियों के लोग रहते थे। वैदिक युग में पितृ सत्तात्मक परिवारों का उल्लेख है, लेकिन पुत्र व पुत्री के सामाजिक व धार्मिक अधिकारों में अन्तर नहीं था। पुत्र के समान ही पुत्री को भी उपनयन, शिक्षा व यज्ञ करने का अधिकार था। प्राचीन काल में पत्नी और माँ के रूप में स्त्री की अत्यधिक प्रतिष्ठा थी।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता (जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं) का भाव भारतीय समाज में था। ऋग्वेद की कुछ रचनाओं की स्रष्टा ऋषियों की तरह ऋषिकाएँ भी थीं। घोषा, अपाला, लोपमुद्रा आदि जैसी विदुषी महिलाएँ याज्ञिक अनुष्ठानों का सम्पादन करती थीं। प्राचीन भारतीय कुटुम्ब का स्वरूप पति – पत्नी, माता – पिता व बच्चों के सम्बन्ध पर आधारित था। पुरुष व स्त्री के सम्बन्धों का मूल आधार विवाह संस्था थी। यही संस्था परिवार की आधारशिला थी। इस प्रकार प्राचीन भारतीय समाज में परिवार व्यवस्था व स्त्रियों की स्थिति अन्य कालों की अपेक्षा अच्छी थी।

प्रश्न 10. प्राचीन भारत में खगोल, ज्योतिष, भौतिकी एवं रसायन विज्ञान की स्थिति का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर: प्राचीन भारत खगोल विद्या, ज्योतिष विधा, भौतिकी एवं रसायन विज्ञान के क्षेत्र में अत्यन्त समृद्ध था। इस बात को हम निम्नलिखित विवरण द्वारा समझ सकते हैं।

1. खगोल एवं ज्योतिष विज्ञान:
अपनी निरीक्षण शक्ति के बल पर प्राचीन भारतीय अन्वेषकों ने अन्तरिक्ष, तारे, ब्रह्माण्ड आदि के विषय में ज्ञान प्राप्त किया। सम्बन्धित ग्रन्थों की रचना की। भारतीय पंचांग प्रणाली से प्रकट होता है कि पृथ्वी का आकार और भ्रमण, सूर्य ग्रहण, चन्द्र ग्रहण, ग्रह – उपग्रह, तारों की गति, सताईस नक्षत्र आदि के बारे में जानकारी व गणना वर्तमान प्रगति विज्ञान के युग में भी सटीक हैं। जब विश्व को पृथ्वी के आकार के बारे में जानकारी नहीं थी तब आर्यभट्ट ने पृथ्वी के भ्रमण का सिद्धान्त प्रतिपादित किया।

तारों व ग्रहों की गति के सूक्ष्म ज्ञान का वर्णन शतपथ ब्राह्मण ग्रन्थ में है। प्राचीन ज्योतिषविदों द्वारा प्रतिपादित चन्द्र का पृथ्वी के चारों ओर घूमना और पृथ्वी का अपने अक्ष पर भ्रमण देखकर बारह राशियाँ, सताईस नक्षत्र, तीस दिन का चन्द्र मास, बारह मास का वर्ष, चन्द्र व सौर वर्ष में समन्वय हेतु तीसरे वर्ष पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) द्वारा समायोजन आदि सिद्धान्त आज भी यथावत् चल रहे हैं।

2. भौतिक तथा रसायन विज्ञान:
कणाद ऋषि वैशेषिक दर्शन के रचयिता एवं अणु सिद्धान्त के प्रवर्तक थे। इनमें हमें प्राचीन भारत में भौतिक विज्ञान की प्रगति की जानकारी मिलती है। कणाद ने पदार्थ (matter) उसके संघटक तत्व व गुण (atoms) का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। अणुओं के संयोजन की विशद् धारणा भी कणाद ने दी। पदार्थ (matter) कार्यशक्ति (power) गति (motion) व वेग (velocity) आदि विषयक भौतिक सिद्धान्त प्राचीन ऋषियों व विद्वानों ने दिये।

यूरोप में 14वीं शताब्दी में भौतिकी के जो. सिद्धान्त प्रस्तुत किये गये, वे पांचवीं शताब्दी के प्रशस्तपाद के ‘पदार्थ धर्म संग्रह’ व व्योम शिवाचार्य के ‘व्योमवती’ ग्रन्थों में उपलब्ध है। प्राचीन काल में भारतीयों को रासायनिक मिश्रण का भी ज्ञान था, इसका उदाहरण मेहरौली (दिल्ली) को लोह स्तम्भ है, जिस पर आज तक जंग नहीं लगा।

 मानचित्र कार्य

प्रश्न 1. भारत के मानचित्र में हड़प्पा – सभ्यता के किन्हीं 4 स्थानों को चिह्नित कर उनके नाम लिखिए।
उत्तर:

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प्रश्न 2. भारत के मानचित्र में सोलह महाजनपद राज्यों को दर्शाइये।
उत्तर:

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परीक्षा परिणाम तैयार करने का एक्सल प्रोग्राम 2023 श्री हीरा लाल जाट

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SHEKHAWATI MISSION 100 NOTES 2022-23 FOR CLASS 10

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